नागपंचमी, विष से अमृत तक
हमारी प्राचीन परंपराएं मात्र रीति-रिवाजों या कर्मकांडों का संग्रह नहीं हैं, बल्कि वे अस्तित्व के विज्ञान और ब्रह्मांडीय संतुलन के गहरे दर्शन पर आधारित हैं। आधुनिक युग में जहां पर्यावरण और मनुष्य के बीच एक कृत्रिम दीवार खड़ी हो चुकी है, वहीं हमारे पर्व हमें हमारी मूल जड़ों और सह-अस्तित्व की भावना से जोड़ते हैं। श्रावण मास में मनाया जाने वाला नागपंचमी का पर्व इसी चेतना का सबसे जीवंत और सुंदर प्रतीक है। यह पर्व केवल एक जीव विशेष की पूजा नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण प्रकृति के प्रति अगाध कृतज्ञता ज्ञापित करने का एक आध्यात्मिक और दार्शनिक उत्सव है।
आध्यात्मिक दृष्टि से सर्प को केवल एक साधारण जीव नहीं माना गया, बल्कि इसे चेतना और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतीक कहा गया है। मानव शरीर के भीतर स्थित मूल ऊर्जा को कुंडलिनी शक्ति कहा जाता है, जिसे सोते हुए सर्प के रूप में दर्शाया जाता है। जब यह ऊर्जा जागृत होती है, तो मनुष्य भौतिक सीमाओं को लांघकर उच्च चेतना की ओर अग्रसर होता है। इसी प्रकार, देवाधिदेव महादेव के गले में नाग का सुशोभित होना यह संदेश देता है कि प्रकृति के सबसे भयानक और विषैले तत्त्व भी यदि नियंत्रण में हों, तो वे संतुलन और सुंदरता का हिस्सा बन सकते हैं। यह भय और नियंत्रण का नहीं, बल्कि पूर्ण स्वीकार और सामंजस्य का प्रतीक है।
श्रावण मास वर्षा ऋतु का समय होता है। इस काल में धरती जलमग्न होती है, जिससे भूमि के भीतर रहने वाले जीव-जंतु अपने बिलों से बाहर आने के लिए विवश होते हैं। एक समय था जब मनुष्य सर्पों के विष और उनके भय के कारण उनसे घृणा या संहार कर सकता था। लेकिन हमारी संस्कृति ने हमें भय को हिंसा में बदलने के बजाय आस्था और सम्मान में बदलने की कला सिखाई। नागपंचमी का पर्व हमें यह याद दिलाता है कि इस पृथ्वी पर केवल मनुष्यों का ही अधिकार नहीं है, बल्कि प्रत्येक जीव इस पारिस्थितिकी तंत्र का एक अनिवार्य हिस्सा है।
अध्यात्म का मूल आधार अहिंसा और करुणा है। नागपंचमी हमें यह सिखाती है कि प्रकृति के साथ हमारा संबंध अधिकार का नहीं, बल्कि सहभागिता का होना चाहिए। जहां मनुष्य अन्य जीवों को नष्ट करने के बजाय उनके अस्तित्व को स्वीकार करता है, वहीं वास्तविक आध्यात्मिकता का जन्म होता है। जब हम नाग देवता की पूजा करते हैं, तो हम प्रत्यक्ष रूप से यह स्वीकार कर रहे होते हैं कि प्रकृति की हर रचना का अपना एक प्रयोजन है। यह पर्व मनुष्य के अहंकार को तोड़कर उसे यह सिखाता है कि वह प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक विनम्र संरक्षक मात्र है।
आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, पारिस्थितिक असंतुलन और जैव-विविधता के संकट से जूझ रही है, तब हमारी परंपराएं हमें रास्ता दिखाने के लिए सबसे मजबूत स्तंभ हैं। नागपंचमी केवल एक पौराणिक कथा या पर्व नहीं है, बल्कि यह जीयो और जीने दो के शाश्वत सिद्धांत की पुनरावृत्ति है। यह पर्व हमें आमंत्रित करता है कि हम अपनी भयमुक्त और करुणा से भरी दृष्टि को अपनाएं, ताकि मनुष्य और प्रकृति मिलकर इस अस्तित्व के संगीत को सुरीला और निरंतर बनाए रख सकें।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह
