सावन सिर्फ़ एक ऋतु का नाम नहीं
प्रकृति जब अपनी तमाम नेमतों और रंगों के साथ खुलकर मुस्कुराती है, तो वह पल केवल ऋतु परिवर्तन का नहीं, बल्कि मानव मन के प्रस्फुटन का होता है। भारतीय संस्कृति और जीवन-पद्धति में सावन (श्रावण मास) केवल एक महीना नहीं, बल्कि एक जीवंत अहसास है,उमंग, हर्ष, खुशी, मुस्कान, हरियाली और उल्लास का एक ऐसा महाकुंभ, जो सूखी धरती और बुझे हुए दिलों में एक साथ नई जान फूंक देता है।
शहरों की चकाचौंध और कंक्रीट के जंगलों से बहुत दूर, जहाँ दिल आज भी मिट्टी की सौंधी खुशबू से धड़कते हैं,वहाँ सावन प्राणों का स्पंदन बनकर उतरता है। जब आसमान में काले घटाएँ घिरती हैं और रिमझिम फुहारें धरती को चूमती हैं, तो गाँव की चौपालों से लेकर खेतों की मेड़ों तक एक अनूठा संगीत गूँज उठता है। यह मौसम प्रकृति के श्रृंगार के साथ-साथ हमारी प्राचीन भारतीय परंपराओं, लोक-संस्कृति और अटूट भावनात्मक रिश्तों
का एक जीवंत दस्तावेज है।
धरा का कायाकल्प और लहलहाती फ़सलें
जेठ और आषाढ़ की तपती दोपहरी में जब खेत तड़प रहे होते हैं और हर तरफ हाहाकार मचा होता है, तब सावन अपने साथ राहत का अमृत लेकर आता है। पहली मानसूनी फुहार के साथ ही सूखी और बंजर दिखने वाली ज़मीन पर रातों-रात मखमली हरी घास की चादर बिछ जाती है।
गाँव के छोर पर खड़े बबूल और पीपल के पुराने पेड़ नहाकर ऐसे चमक उठते हैं मानो किसी ने उन्हें नया श्रृंगार दे दिया हो। दूर-दूर तक फैली ज़मीन पर जब लहलहाती फ़सलें सिर उठाती हैं, और धान के हरे-भरे पौधे हवा के झोंकों के साथ झूमते हैं, तो किसानों के मुरझाए चेहरों पर जो सुकून भरी मुस्कान तैरती है,
वह दुनिया की किसी दौलत से खरीदी नहीं जा सकती। ऐसा प्रतीत होता है जैसे धरती माता अपनी हरी चुनरी ओढ़कर इठला रही हो।
सावन की आत्मा,,,भुजरिया पर्व और ग्रामीण भाईचारा
सावन की बात हो और ग्रामीण भारत की माटी से जुड़े पवित्र पर्व ‘भुजरिया’ (कजलियां)
का जिक्र न हो, तो यह आलेख अधूरा रहेगा। नागपंचमी के बाद और रक्षाबंधन के आसपास मनाया जाने वाला यह पर्व ग्रामीण संस्कृति की वास्तविक आत्मा है।
सावन के शुरुआती दिनों में बहनें और माताएँ घरों में बांस की छोटी टोकरियों या बर्तनों में साफ़-सुथरी मिट्टी डालकर गेहूं या जौ बोती हैं। इसे एकांत और पवित्र स्थान पर रखकर रोज़ सप्रेम सींचा जाता है। कुछ ही दिनों में जब वे नन्हें, सुनहरे-हरे तिनके उगकर बाहर आते हैं, तो उन्हें ‘भुजरिया’ कहा जाता है।
रक्षाबंधन के दिन या उसके अगले दिन इन भुजरिया के पौधों को बहुत ही श्रद्धा और सत्कार के साथ निकाला जाता है। गाँव की गलियों में ढोल-ढमाकों और पारंपरिक लोकगीतों की गूँज के साथ महिलाएँ और पुरुष इन्हें सिर पर रखकर नदियों तक ले जाते हैं। बुजुर्गों के पैर छूकर यह हरी-भरी भुजरिया देकर आशीर्वाद लिया जाता है।
यह पल केवल एक रस्म नहीं है, बल्कि पीढ़ियों के बीच के आदर, भाईचारे और प्रेम का ऐसा भावनात्मक बंधन है, जो दिलों की सभी दूरियों को मिटा देता है। इस एक मुट्ठी हरियाली और आशीर्वाद के आदान-प्रदान में पूरा गाँव एक परिवार बन जाता है।
रिमझिम बारिश और लोक-जीवन के रंग
सावन की पहचान इसकी रिमझिम बारिश से है। यह वह बारिश नहीं जो आंधी-तूफान लाकर तबाही मचाए,यह तो एक धीमी, सुरीली और मद्धम फ़ुहार है, जो सीधे मन के तारों को छेड़ जाती है। जब आसमान से अमृत रूपी जल बूंदों के रूप में गिरता है, तो सूखी मिट्टी की सोंधी खुशबू हवा में घुल जाती है। टप-टप गिरती बूंदों के साथ पपीहे की पी-कहां की टेर और मेंढकों की टर्र-टर्र मिलकर ऐसा प्राकृतिक संगीत रचती है, जिसे सुनकर सुध-बुध खो बैठना स्वाभाविक है।
इस मौसम में गाँव की बहुएँ और बेटियाँ मिलकर पेड़ों की डालियों पर झूला डालती हैं। झूले की रस्सी जब आसमान को छूने दौड़ती है, तो उनके गले से फूटे लोकगीत,कजरी और मल्हार—हवा में घुल जाते हैं। उन गीतों में मायके की याद होती है, सावन की उमंग होती है और प्रियतम के इंतज़ार की वो मीठी कसक होती है, जो आँखों में चमक और होठों पर मुस्कान ले आती है। चारों तरफ़ बिखरे रंगीन नज़ारे खेतों की हरियाली, लाल-हरी चूड़ियाँ, और आसमान में सतरंगी इंद्रधनुष,मन को पूरी तरह मोह लेते हैं।
उल्लास और भावनाओं का संगम
सावन का यह महीना हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है। यह सिखाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी धूप और तपन क्यों न आए, एक दिन प्रेम, भाईचारे और संतोष की फ़ुहारें उसे हरा-भरा जरूर कर देती हैं।
जब गाँव का हर व्यक्ति भुजरिया के बहाने गले मिलता है, जब बच्चे रिमझिम बारिश में कागज़ की नाव तैराते हैं, और जब बुजुर्ग नीम की छांव में बैठकर पुरानी यादें ताजा करते हैं,तब समझ आता है कि असली भारत इन्हीं गाँवों की सोंधी खुशबू और संस्कृति में बसता है।
सावन सिर्फ़ एक ऋतु का नाम नहीं, यह हमारे संस्कारों, भावनाओं और जीवन के उत्सव का दूसरा नाम है। यह याद दिलाता है कि जीवन में संघर्ष के बाद उल्लास और उमंग के दिन अवश्य आते हैं। जब भी जीवन में निराशा घिरे, बस सावन की किसी रिमझिम शाम और अपनों के आत्मीय मिलन को याद कर लीजिए, मन स्वतः ही प्रफुल्लित हो उठेगा।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
