लेखक का दर्द, उनकी संवेदना : एक मर्मस्पर्शी विश्लेषण
एक पिता को मिला तिरस्कार वीडियो काल पर
..अंतिम विदाई..
आज कलम भी बदहवास है,
कलम की स्याही भी उदास है!
ता उम्र सदैव हंस कर
एक पिता का फर्ज निभाया
रोहतक में एक चिता नहीं जली
आज एक पिता का विश्वास जला!
रिश्तों का इतिहास शर्मसार हुआ!
जिसने ऊंगली पकड़ चलना सिखाया,
हर आंसू को दिल में छिपाया,
आज उनके कांधे भी उठाने नहीं आए!
हर खुशियां बेटियों के नाम लिख दी,
आज वृद्बाआश्रम की खामोश
दीवारें आज रो रही है!
आज तो गंगा माई भी रोई होगी
पिता दरवाजे की ओर देखता था,
तीन बेटियों में से एक बेटी आएगी,
राह देख बोझिल मन हो गया
आज नहीं तो कल जरूर आएगी,
एक दिन सांसों ने साथ छोड़ दिया,
संस्था ने तीनों बेटियों को संदेश दिया,
आपके पिता अब दुनिया में नहीं रहे,
बेटी ने कहां संस्कार कर दीजिए
पिता की लाचार तमन्नाए,
बेटी वीडीओ काल पर दे गई विदाई!
मानो औपचारिकताए हो गई,
आज तो गंगा मैया भी रोई होगी
ऐसे शब्द इंसानियत को रूला गए!
बेटी का हतप्रद संदेश वाह री दुनिया
जल्दी करिए मुझे स्नान करना है
भोजन भी करना है वाह री दुनिया
केसी विडंबना एक पिता कि अस्थियां
अपनों के स्पर्श के लिए तरस गई!
वेभव पद प्रतिष्ठा मिल जाएगी
पिता का साथ कभी नहीं मिलेगा!
अस्थियों तक ने अपना नाता तोड़ दिया,
पिता की अर्थी पर
बेटियांआंसू बहाने नहीं आई!
नश्वर काया आज जल गई है,
पर आत्मा आज भी जीवंत है!
बेटी की याद में पिता की आंख बुझ जाए
महल ओर अटारी भी सूनी है!
— गोविन्द सूचिक हरदा मध्यप्रदेश
परम आदरणीय गोविन्द सूचिक जी, द्वारा रचित यह कविता आधुनिक समाज के उस काले सच को उजागर करती है, जहाँ भौतिक विकास और स्वार्थ के अंधी दौड़ में रिश्तों की पवित्रता, संवेदनाएं और मानवीय मूल्य दम तोड़ रहे हैं। यह रचना केवल एक पिता की व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है, बल्कि यह आज की युवा पीढ़ी की उस संवेदनहीनता पर एक गंभीर कटाक्ष है, जो जीवनभर पालने-पोसने वाले माता-पिता को वृद्धाश्रम या अकेलेपन की भट्ठी में झोंककर अपनी दुनिया में व्यस्त हो जाती है।
कविता के मुख्य भाव और संवेदना के बिंदु,,,
असमर्थ और लाचार पिता का इंतेज़ार,कविता का सबसे बड़ा मर्म उस पिता की प्रतीक्षा में छिपा है जो वृद्धाश्रम की चारदीवारी के बीच या अकेलेपन में अपनी तीनों बेटियों की राह जोह रहा था। उसे उम्मीद थी कि शायद कभी तो बेटियां उसे देखने आएंगी, लेकिन उसका यह विश्वास और उम्मीदें अंततः दम तोड़ गईं।
वीडियो कॉल पर ‘अंतिम विदाई’ (आधुनिकता का अभिशाप)रचना का सबसे विचलित कर देने वाला दृश्य वह है जहाँ बेटियों ने पिता के अंतिम दर्शन के लिए आने के बजाय वीडियो कॉल पर ही औपचारिकता निभा दी। “जल्दी करिए मुझे स्नान करना है, भोजन भी करना है”,जैसे वाक्य इस बात का प्रमाण हैं कि आज के दौर में अपनों की मौत भी केवल एक काम या बाधा बन गई है जिसे जल्दी से (निपटाना) जरूरी समझा जाता है।
विश्वास और रिश्तों की चिता,,,रोहतक में जली वह चिता केवल एक नश्वर शरीर की नहीं थी, बल्कि वह उस भरोसे और समर्पण की चिता थी जो एक पिता ने अपनी पूरी जिंदगी खून-पसीना बहाकर सींचा था। लेखक आदरणीय गोविन्द सूचिक जी ने बहुत ही सुंदर और पीड़ादायक शब्दों में कहा है,रोहतक में एक चिता नहीं जली, आज एक पिता का विश्वास जला!”
क़लम की बेबसी और प्रकृति का रोना,,,कविता की शुरुआत में ही लेखक अपनी लाचारी व्यक्त करता है कि ऐसी अमानवीय घटना को देखकर उसकी “क़लम भी बदहवास” और “स्याही उदास” है। यहाँ तक कि गंगा मैया भी इस विडंबना पर रोई होंगी, क्योंकि जिस भारतीय संस्कृति में माता-पिता को ईश्वरतुल्य माना जाता था, वहाँ उनकी अर्थी को कंधा देना तो दूर, अस्थियों को अपनों का स्पर्श तक नसीब नहीं हुआ।
यह कविता पाठकों के मन में एक गहरा शून्य और टीस छोड़ जाती है। गोविन्द सूचिक जी ने अपनी संवेदनशील लेखनी से यह चेतावनी देने का प्रयास किया है कि वैभव, पद और प्रतिष्ठा चाहे कितनी भी मिल जाए, लेकिन माता-पिता का साया और उनका प्यार दोबारा नहीं मिलता। यदि समाज ने अपने गिरते हुए मानवीय मूल्यों को नहीं संभाला, तो आने वाले समय में रिश्ते केवल मोबाइल की स्क्रीन और वीडियो कॉल्स तक ही सिमटकर रह जाएंगे। यह रचना समाज के अंतःसत्व को झकझोरने और आत्ममंथन करने के लिए बाध्य करती है।उफ़,,,
— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह सहज
