गीत/नवगीत

ऐसे ढोंगी से बचो

भय दिखलाकर पाप का, माँगे दान अपार।
ऐसे ढोंगी से बचो, तभी बचे संसार॥

पाप-पुण्य का डर दिखा, बाँधे मन की डोर,
भोली जनता को ठगें, लगा-लगा कर जोर।
श्रद्धा को व्यापार कर, लूटें बारंबार—
ऐसे ढोंगी से बचो, तभी बचे संसार॥

झूठे चमत्कार का, रचते ऐसा जाल,
भय के संग विवेक का, पड़ता तभी अकाल।
अंधभक्ति में खो गया, मानव का अधिकार—
ऐसे ढोंगी से बचो, तभी बचे संसार॥

दान-दक्षिणा के नाम पर, भरते स्वयं भंडार,
भक्तों के विश्वास का, करते कारोबार।
धर्म की ओट में छिपा, स्वार्थ का विस्तार—
ऐसे ढोंगी से बचो, तभी बचे संसार॥

गुरु वही जो राह दे, भरे विवेकी ज्ञान,
जो डर भरकर लूटता, कैसा वह इंसान।
सच्ची श्रद्धा सत्य में, झूठे से इंकार—
ऐसे ढोंगी से बचो, तभी बचे संसार॥

आस्था रखिए सत्य में, रखिए मन में ज्ञान,
डर से कोई धर्म नहीं, मानवता महान।
सोच-समझकर चलिएगा, मत खोना अधिकार—
ऐसे ढोंगी से बचो, तभी बचे संसार॥

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh