तुम्हारी अकड़
मैं उनसे पूछता हूँ
किस बात के लिए
तुम अकड़ में हो
छोटी सी उम्र है
छोटी सी औकात है
तुम्हारा यह गुमान
तुम्हारी जो सल्तनतें हैं
तुम जो छोटा सा
एक वजूद बना रखे हो
वह ढह जायेगा
एक खंडहर की तरह
तुम्हारी बादशाहत
बंदी बना ली जायेगी
तब तुम मौत को
स्वयं अपने पास बुलाओगे
तब सब पाप
तुमको डसेंगे
तुम कुछ नहीं कर सकते
हाँ, तुम कुछ नहीं कर सकते
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
