गीत/नवगीत

बेशक अब तक मरे नहीं हो

1-
सीने में दिल धड़क रहा हो
भाव-भूमि अब तक हो भींगी
कभी कभी दिल की देहरी पर
पांव पटकने का मन होता
थोड़ी सी मुट्ठी भिंच जाती
थोड़े से जबड़े खिंच जाते
आंखों की कोरें गुस्साकर
थोड़ी चिंगारी बरसातीं
कोमल – से उन्नत ललाट पर
वक्री रेखाएं तन जातीं
बाह फड़कने लगे और
मन करे कि उसका गला घोट दूं
जिसने मानवता के मुंह पर
पोती हो जबरन कुछ स्याही।

अपराधी दुनिया से अब तक,
तुम पूर्णतया डरे नहीं हो।

2-
आंचल के रक्षित बंकर में
सुधा पानकर बड़े हुए हो
किसी बड़े की थाम अंगुली
मृदु पैरों पर खड़े हुए हो
तेरी सारहीन ध्वनि सुनकर
कानों में अमृत भर जाता
भर जाता वात्सल्य हृदय में
बाउर मन गर्वित हो जाता
अब उड़ते हो आसमान में
उड़ो, मगर ये मत भूलो
इसी धरा के सदय वक्ष पर
लाखों बार लात की ठोकर
मार- मारकर चलना सीखे
तुम माटी के ढेल सरीखे।

आंखों में गर लाज बची हो,
निर्दयता से भरे नहीं हो।

3-
कुछ समाज, कुछ संविधान ने
नियम और कानून बनाए
कभी- कभी मन में आता है
तोड़ इन्हें आजादी पाएं
अपनी आजादी की सीमा
वहीं, जहां से अन्य गुजरती
एक-दूसरे से टकराहट
कभी नहीं हो, निश्चित करती
संविधान केवल अनुशासन
लेकिन बहुत जरूरी है ये
इसे मानना कर्म हमारा
कहो नहीं, मजबूरी है ये
अगर जरूरी हो जाए तो
बहुमत से बदला जाए

इतना गर तुम सोच सको तो,
कर्म सुपथ से परे नहीं हो।

— डॉ. अवधेश कुमार अवध

*डॉ. अवधेश कुमार अवध

नाम- डॉ अवधेश कुमार ‘अवध’ पिता- स्व0 शिव कुमार सिंह जन्मतिथि- 15/01/1974 पता- ग्राम व पोस्ट : मैढ़ी जिला- चन्दौली (उ. प्र.) सम्पर्क नं. 919862744237 Awadhesh.gvil@gmail.com शिक्षा- स्नातकोत्तर: हिन्दी, अर्थशास्त्र बी. टेक. सिविल इंजीनियरिंग, बी. एड. डिप्लोमा: पत्रकारिता, इलेक्ट्रीकल इंजीनियरिंग व्यवसाय- इंजीनियरिंग (मेघालय) प्रभारी- नारासणी साहित्य अकादमी, मेघालय सदस्य-पूर्वोत्तर हिन्दी साहित्य अकादमी प्रकाशन विवरण- विविध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन नियमित काव्य स्तम्भ- मासिक पत्र ‘निष्ठा’ अभिरुचि- साहित्य पाठ व सृजन