तृप्ति
“पापाजी! खाना रखा है, खा लीजिएगा। दो बजे बाई सफाई करने आएगी, कहीं जाइएगा मत।” पति सुधीर के जाने के बाद, बहू शालिनी हमेशा की तरह मेज पर खाना ढककर किटी पार्टी के लिए निकल गई। यशजी ने कोई जवाब नहीं दिया। भरे पूरे घर के इस सन्नाटे और अकेलेपन से घबराकर उन्होंने दीवार पर टंगी स्वर्गीय पत्नी सुलक्षणा की तस्वीर देखी, आँखें पोंछीं और सामने पार्क में जाकर बैठ गए।
वह गुमसुम बैठे ही थे कि एक फटेहाल छोटा लड़का आया और गिड़गिड़ाकर बोला, “बाबूजी! कुछ पैसे दे दो, बहुत भूख लगी है।”
लड़के की लाचारी देखकर यशजी का दिल पसीज गया। उन्हें घर पर रखा वह बेमन का खाना याद आया, जिसे अकेले खाने की उनकी इच्छा नहीं थी। उन्होंने पूछा, “खाना खायेगा?”
बच्चे ने हामी भरी।
वे बच्चे को घर ले आए और बरामदे में रखी कुर्सी पर बैठा दिया। पूरा खाना उसके सामने परोस दिया।
बच्चा बड़े चाव से खाने लगा। खाने के बाद जब उसने मुस्कुराते हुए यशजी के पैर छुए, तो बरसों बाद यशजी को अपना पेट भरा हुआ महसूस हुआ।
— डाॅ अनीता पंडा ‘अन्वी’
