फर्ज किसका?
स्वाधीनता दिवस का उत्सव बड़े धुमधाम से मनाया गया। जोश के साथ बड़े-बड़े वादे किए गए। मिठाइयां बांटी गई। बच्चे खुशी से झूम रहे थे।
सारा मंडप खाली हो गया था। मंत्री जी, उनके साथी, दर्शक चले गए थे। अस्त-व्यस्त बिखरा बिखरा कचरा था चारों ओर। कहीं-कहीं पर तिरंगा ध्वज कुर्सियों पर रखा हुआ था। अनुशासन प्रिय, देशभक्त चुन्नु, मुन्नू, सुरेखा, राधा ने उद्विग्न मन से सारे ध्वज एकत्र किए। पानी की बोतलें, रैपर इकठ्ठे किए।
” कब सुधरेंगे हम और हमारे भारत वासी?”
” देश हमारा, तो फर्ज किसका?”
अनुत्तरित प्रश्न का अब तक जवाब ढूँढ रहे हैं बच्चे।
स्वरचित मौलिक लघुकथा
चंचल जैन
मुंबई, महाराष्ट्र
