अटक गई है शाम रे
ढली शाम ने छेड़ दी, यादों वाली तान।
सूने मन के द्वार पर, लौटे बीते गान॥
पतझर आया पेड़ पर, झरते जब हैं पात।
सूनी डाली पूछती, कहाँ गए दिन-रात॥
बादल आए चल दिए, लेकर अपनी छाँव।
पेड़ खड़ा तकता रहा, सूना अपना गाँव॥
यादों का संदूक जब, खुलता बारंबार।
बीते दुख की पीर फिर, करती दिल पर वार॥
जीवन ताशों-सा मिला, जीत मिले या हार।
खेल समय के साथ ही, यही जगत व्यवहार॥
अनुभव जीवन सींचता, काँटे इसकी राह।
चलते-चलते सीखता, मन जीवन की चाह॥
बूढ़ों को मत छोड़िए, वे घर की पहचान।
उनसे ही आँगन बचे, उनसे घर में प्राण॥
सूने मन में प्रेम की, फिर से जागे प्रीत।
बूढ़ी आँखों में हँसी, बनकर गूँजे गीत॥
प्रेम बिना यह जिंदगी, जैसे सूना गाँव।
प्रेम मिले तो पतझरों, में खिल उठती छाँव॥
शाम भले ही अटक जाए, थमने मत दो प्राण।
जीवन के हर मोड़ पर, प्रेम रहे मुस्कान॥
अटक गई है शाम रे, यादों के उस गाँव।
प्रेम बचा यदि जिंदगी, खिलती हर इक छाँव॥
— डॉ. सत्यवान सौरभ
