लघुकथा

कमीज का कॉलर

विधा- लघुकथा
शीर्षक- कमीज का कॉलर

देवी को पता था कि उसके माता-पिता, भाई-बहन कोई नहीं है और वह रिश्ते की नानी के घर पल रही है. भले ही उसे बेहद प्यार-अपनापन मिलता था, फिर भी वह संभल-संभलकर चलती और किसी को शिकायत नहीं देने का पूरा प्रयास करती. भाग-भागकर सबकी मदद करती, किसी के छोटे-छोटे काम को भी नजर अंदाज़ नहीं करती. नानी और मामी को काम करते देखकर ही बहुत कुछ सीख गई थी. पढ़ने के साथ ही खाना बनाना, साफ-सफाई करना, कपड़े धोना, प्रेस करना बड़े प्यार और सावधानी से करती.
उसकी नानी सिलाई में बहुत निपुण थीं. बड़े ध्यान से देवी उनको कपड़े काटते-सिलते देखती. उसे भी सिलाई का शौक लग गया.
“नानी मैं मशीन से थोड़ी सिलाई करके देखूं?” उसने एक दिन नानी से निहोरा किया.
“कर ले बेटा.” नानी ने मशीन छोड़कर उसे मशीन पर सिलाई करने दी.
“नानी सिलाई टेढ़ी हो गई.”
“कोई बात नहीं बेटा, पहले-पहल मेरी सिलाई भी टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती थी. अभ्यास करते-करते अब बहुत बढ़िया होती है, घबरा मत, अभ्यास करती जा, सब आ जाएगा.” नानी ने प्यार करते हुए कहा.
सचमुच वह सिलाई में कुशल होती गई. सारे कपड़े देख-देखकर सिल लेती, पर कमीज का कॉलर बनाना नहीं आता था.
एक दिन उसके मामा ने उसे एक कमीज पर लगा सब्जी का दाग हटाकर धोने के लिए कमीज दी. उस दिन घर पर कोई नहीं था. उसने कमीज धोकर उसका कॉलर उधेड़ कर देखा और फिर उसकी सिलाई कर दी. अब उसे कमीज का कॉलर बनाना भी आ गया.
नानी ने भी उसको बहुत शाबाशी दी और मामी ने भी. उसने मन-ही-मन स्कूल में पढ़ा दोहा दोहराया—
“करत-करत अभ्यास ते, जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत-जात ते, सिल पर परत निशान॥”
उस दिन सावित्री ने केवल कमीज का कॉलर बनाना ही नहीं सीखा था, अभ्यास की ताकत को भी पहचान लिया था.
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244