प्रावृट् ने रच ली हैं ऋचाएं
विधा- कविता
शीर्षक- प्रावृट् ने रच ली हैं ऋचाएं
मेघमंद्र कर बरसी बदरिया,
बह चली सावनी बयार सुहानी,
मनमोहक हो गई प्रकृति सारी,
मन में भर गई मौज रुहानी।
अंबुआ की डारी पर लगे झूले,
सखियां झूलें कजरी गाएं,
दोलोत्सव की धूम मची है,
प्रावृट् ने रच ली हैं ऋचाएं।
अमराई में कोयल कूके,
नाच उठा मेरे मन का मोर,
तपित ताप से राहत पाई,
मन ने पाया खुशियों का छोर।
रंगबिरंगे फूल खिल गए,
धरती ने ओढ़ी धानी चुनरिया,
दादुर-मोर-पपीहरा बोलें,
धुल गए पेड़-रस्ते-अटरिया।
गरजे मेघ चमक उठी बिजुरिया,
मेघ मल्हार की छिड़ गई तान,
पिया का संदेसवा लाई बदरिया,
खिल उठी मेरे मन की मुस्कान।
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
अर्थ
दोलोत्सव- हिंडोले या झूले का उत्सव
प्रावृट्- मौसम
मेघमंद्र- बादल जैसी गंभीर, गहरी और गूँजती हुई आवाज (या स्वर)
शिखरिणी- श्रेष्ठ स्त्री, एक विशेष पेय (शिखरन/श्रीखंड), रोमावली
