इतिहास

बलड़ी

दुनिया कहती है कि पानी केवल प्यास बुझाता है, लेकिन पूछिए उन आँखों से जिन्होंने अपने आँखों के सामने अपने ही गाँव को जलसमाधि लेते देखा है। उनके लिए वह पानी केवल ‘इंदिरा सागर’ का जलाशय नहीं था, बल्कि उनकी मिट्टी, उनकी तहज़ीब, और उनके बचपन पर चढ़ी एक ऐसी चादर थी जिसने सब कुछ हमेशा के लिए ढँक दिया। खंडवा जिले की हरसूद तहसील की गोद में बसा गाँव ‘बलडी’ आज भले ही भूगोल के पन्नों से मिट चुका हो, लेकिन अहसासों के भूगोल में वह आज भी उतना ही हरा-भरा और ज़िंदा है।
यह महज़ एक गाँव की कहानी नहीं है, यह किसी ऐसी क्लासिक फ़िल्म के उस आखरी मंज़र की तरह है जहाँ सब कुछ शांत हो जाता है, पर दर्शक का दिल हमेशा के लिए भर आता है।
माटी की सोंधी खुशबू और बचपन की बेफ़िक्री
बलड़ी की सुबहें सूरज की किरणों से पहले मुर्गों की अज़ान और मंदिरों की घंटियों से जागा करती थीं। कच्चे मकानों के आँगनों में गोबर से लीपी गई ज़मीन पर बिखरी धूप ऐसी लगती थी मानो कुदरत ने खुद सोना बिछा दिया हो। नीम और बरगद की ठंडी छाँव तले सजने वाली चौपालें केवल बैठकर बातें करने की जगह नहीं थीं, वे गाँव की अदालत, सुख-दुख की साझीदार और अपनों का संबल हुआ करती थीं।
बचपन की यादें यहाँ के खेतों की मेढ़ों, धूल भरे रास्तों और ताल-तलैयों में बिखरी पड़ी थीं। वो बारिश के दिनों में छतों से टपकती बूंदों की संगीत जैसी आवाज़, दोस्तों के साथ बिना किसी फ़िक्र के आम के बगीचों में दौड़ना, और शाम ढले घर लौटने पर माँ के हाथों की सोंधी रोटियों का इंतज़ार, बलड़ी का हर कोना एक ख़्वाब जैसा था। वहाँ हर घर का दरवाज़ा हर किसी के लिए खुला रहता था, क्योंकि मकान छोटे ज़रूर थे, पर दिल समंदर से भी बड़े थे।
त्योहारों की रूह,राखी और भुजरिया का वो आत्मीय दौर
जब बलड़ी में त्योहार आते थे, तो लगता था जैसे पूरी काइनात खुशियाँ बाँटने ज़मीन पर उतर आई हो। राखी का पर्व केवल कलाई पर धागा बाँधने तक सीमित नहीं था। वह सगे और मुँहबोले रिश्तों की उस पाकीज़ा डोर को और मज़बूत करता था जो कभी टूटने का नाम नहीं लेती थी।
और राखी के अगले ही दिन आने वाला ‘भुजरिया’ (कजरी नवमी) का त्योहार? वह तो बलड़ी के दिल की धड़कन हुआ करता था। ताज़े गेंहू के अँगुरों (भुजरियों) से सजी टोकरियों को जब गाँव की महिलाएँ और लड़कियाँ सिर पर उठाकर जल-स्रोतों की ओर बढ़ती थीं, तो पूरा वातावरण लोक-गीतों की मिठास से गूँज उठता था। नदी-पोखरों पर भुजरिया का विसर्जन करने के बाद, एक-दूसरे को लगाकर गले मिलना और “राम-राम” कहना केवल एक रस्म नहीं थी,वह टूटे हुए दिलों को जोड़ने और रंजिशों को हवा में उड़ा देने का सबसे ख़ूबसूरत ज़रिया था।
मांदल की थाप पर थिरकती आदिवासी संस्कृति
बलड़ी की असली रूह यहाँ के आदिवासी समुदाय के पारंपरिक लोक-जीवन में बसती थी। उनकी सादगी, उनका प्रकृति से जुड़ाव और उनका संगीत इस माटी का असली आभूषण था।
जब ढोल और मांदल की गहरी, गंभीर थाप गूँजती थी, तो ऐसा लगता था जैसे बलड़ी की ज़मीन का एक-एक कण धड़कने लगा हो। भगोरिया और रीना जैसे पारंपरिक लोक-नृत्यों में जब नर्तक अपने पारंपरिक पहनावे में थिरकते थे, तो हर देखने वाले का दिल ख़ुशी से भर जाता था। बाँसुरी की वो मद्धम तान और मांदल की थाप पर गाए जाने वाले लोक-गीतों में केवल सुर-ताल नहीं होते थे,उनमें सदियों का इतिहास, जंगल-ज़मीन से मोहब्बत और अपनी जड़ों से बेइंतहा लगाव की दास्तान छुपी होती थी।
विस्थापन की वो कड़वी कसक और जलसमाधि
फ़िर वो वक्त भी आया जब ‘विकास’ के नाम पर बलड़ी को अपनी ही माटी से बेदखल होना पड़ा। इंदिरा सागर बांध का पानी जब धीरे-धीरे गाँव की तरफ़ बढ़ने लगा, तो वह केवल पानी नहीं था, वह एक ज़िंदा तहज़ीब को निगलने आ रहा अजगर था।
अपने ही हाथों से अपने पुश्तैनी घरों को उजाड़ना, अपनी जड़ों से उखड़ना, और उन गलियों को अलविदा कहना जहाँ बचपन की किलकारियाँ गूँजी थीं,वह मंज़र किसी जीते-जी मौत से कम नहीं था। लोगों ने केवल सामान नहीं बाँधा था; उन्होंने अपनी यादें, अपने पुरखों के आशीर्वाद और अपनी पहचान को भी गठरी में बाँध लिया था। जब बलड़ी पानी में डूब रहा था, तो सिर्फ़ मकान नहीं डूबे थे, हर आँख से बहे आँसुओं का समंदर उस जलाशय में जा मिला था।
जो नक़्शे में खो गया, पर यादों में अमर है
आज बलड़ी नक़्शे पर एक नाम मात्र हो सकता है। जहाँ कभी हँसता-खेलता गाँव हुआ करता था, आज वहाँ जल का एक विशाल और ख़ामोश फैलाव है। पर सच तो यह है कि पानी बलड़ी के मकानों को तो डुबो सका, लेकिन उस गाँव की आत्मा, उसकी संस्कृति और उसके अहसासों को नहीं डुबो पाया।
जब भी हवा में माटी की सोंधी ख़ुशबू आती है, जब भी मांदल की थाप कहीं दूर सुनाई देती है, या जब भी भुजरिया का पर्व आता है,बलड़ी अपने तमाम रंगों के साथ उन लोगों की यादों में दोबारा जी उठता है। बलड़ी इतिहास के पन्नों में खोया हुआ एक ऐसा ख़ूबसूरत अफ़साना है, जिसे जब भी पढ़ा जाएगा, आँखें नम हो जाएँगी और दिल गर्व से भर जाएगा।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।