कविता

मानव में मानवता न रही!

विधा- कविता
शीर्षक- मानव में मानवता न रही!

मानव तो मानव है लेकिन,
मानव में मानवता न रही,
अपने ही स्वार्थ में है डूबा,
स्नेह की सरिता नहीं बही।

करुणा-प्रेम न जाने कहाँ हैं,
धैर्य भी जैसे है खोया-सा,
कहता मानव जाग रहा हूँ,
लगता बिलकुल सोया-सा!

अपना दर्द सहा नहीं जाता,
दूजे का देख कर मौन रहे,
गीता के बस श्लोक पढ़ लिए,
ऐसे को मानव कौन कहे!

भेदभाव की कारा तोड़ें,
दीन-दुःखी का दर्द हरें,
तब ही मानव कहलाएं जब,
मानवता के कर्म करें!
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244