मानव में मानवता न रही!
विधा- कविता
शीर्षक- मानव में मानवता न रही!
मानव तो मानव है लेकिन,
मानव में मानवता न रही,
अपने ही स्वार्थ में है डूबा,
स्नेह की सरिता नहीं बही।
करुणा-प्रेम न जाने कहाँ हैं,
धैर्य भी जैसे है खोया-सा,
कहता मानव जाग रहा हूँ,
लगता बिलकुल सोया-सा!
अपना दर्द सहा नहीं जाता,
दूजे का देख कर मौन रहे,
गीता के बस श्लोक पढ़ लिए,
ऐसे को मानव कौन कहे!
भेदभाव की कारा तोड़ें,
दीन-दुःखी का दर्द हरें,
तब ही मानव कहलाएं जब,
मानवता के कर्म करें!
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
