कविता

नसीब

रात के सोने का समय था
करीब दस बजे गये थे

लोग घरों को जा रहे थे
बहुत लोग चले गये थे

सड़कों पर
भीड़ कम हो रही थी

थकी सी
एक युवती ने
फुटपाथ पर
एक चद्दर बिछाया

चद्दर पर
उसका आठ साल का लड़का
दोनों चुपके से बैठे

जब दुनिया
भरपेट खाकर
मोटे मुलायम गद्दों पर
नींद की खर्राटे ले रहा था

एक छोटे से दोने में
मां और बेटे
कुछ खाते नजर आ रहे थे

नाश्ते से भी कम
आहार रहा होगा

उसी थोड़े से आहार में
दोनों को रात गुजारनी थी

हाय रे नसीब!

— जयचन्द प्रजापति “जय’

*जयचन्द प्रजापति

प्रयागराज मो.7880438226 jaychand4455@gmail.com