लघुकथा

परवरिश

काफी देर से बच्चों को पुकार रहे थे, किसी के कानों में जूं तक नहीं रेंग रहा था । क्यों हो गया बच्चों का ऐसा स्वभाव ? मैं तो अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाता आया हूँ , तीनों बेटे ग्रेजुएशन पूरा कर बेरोजगारों की लाइन में लग गये । मेरी परवरिश में कहां कमी रह गई ?
ना प्रतियोगिता की तैयारी नाहीं दौड़-धूप कर कहीं नौकरी तलाश रहे हैं क्या करूं मैं ? स्वयं को सवालों के घेरे में उलझते हुए पसीने-पसीने हो रहे थे । कहां कमी रह गई ?
कमरे में लक्ष्मी में आई आते ही कहने लगी–
“बच्चों को घरेलू काम या सहायता करने से आप ही सदैव रोकते आये हैं । यह कहते हुए कि तुम दिन-भर घर में ही रहती हो, घर की जिम्मेदारियों को संभालना तेरा काम है । पत्नी अर्धांगिनी होती है आपने कभी सोचा ही नहीं ।”
“ऐसा कौन सा पहाड़ टूट पड़ा जो आप बच्चों पर चिल्लाए जा रहे हैं ?”
“मुझे बाथरूम जाना था, पैर में प्लास्टर की वजह से तुम मुझे संभाल नहीं पाओगी इसीलिए बच्चों को आवाज दे रहा था ।”
वह कंधे का सहारा देकर उठाते हुए कहने लगी –
“आपको सिर्फ दो महीने बैसाखी का सहारा लेकर चलना है । लेकिन आप तो अपने बच्चों की बैसाखी स्वयं बन गये हैं । कभी सोचा है तीन जोड़ी बैसाखियों को कब तक संभाल पायेंगे हम दोनों ?”

— आरती राय

*आरती राय

शैक्षणिक योग्यता--गृहणी जन्मतिथि - 11दिसंबर लेखन की विधाएँ - लघुकथा, कहानियाँ ,कवितायें प्रकाशित पुस्तकें - लघुत्तम महत्तम...लघुकथा संकलन . प्रकाशित दर्पण कथा संग्रह पुरस्कार/सम्मान - आकाशवाणी दरभंगा से कहानी का प्रसारण डाक का सम्पूर्ण पता - आरती राय कृष्णा पूरी .बरहेता रोड . लहेरियासराय जेल के पास जिला ...दरभंगा बिहार . Mo-9430350863 . ईमेल - arti.roy1112@gmail.com