पिता ओर पुत्र
माथे पर शिकन सही, पर सीने में अथाह प्यार है,
पिता और पुत्र का बंधन, इस कायनात का अनूठा श्रृंगार है।
ना कोई इकरार है यहाँ, ना इज़हार की दरकार है,
यह वो मौन रिश्ता है, जिसमें बस त्याग और उपहार है।
पिता ने तोड़े अपने शौक सारे, बस एक मुस्कान के वास्ते,
चलते-चलते छाले पड़े पैरों पर, पर आसान किए बेटे के रास्ते।
जो खुद भूखा सोया हो कभी, वो निवाला मुँह में खिलाता है,
एक बाप ही है, जो अपनी हार में भी, बेटे की जीत मनाता है।
अब वक्त का पहिया घूमा है, कुछ नए अंदाज़ आए हैं,
बेटे के मजबूत कंधों पर, अब पिता के साए आए हैं।
जब कांपते हाथों को थामता है वो बेटा प्यार से,
तो झलकता है अक्स पुराना, उसी अटूट दुलार से।
पीढ़ी दर पीढ़ी चलती ये रीत है,
जहाँ हर हार में भी, एक अनोखी जीत है।
— धर्मेन्द्र शर्मा
