कविता

पिता ओर पुत्र

माथे पर शिकन सही, पर सीने में अथाह प्यार है,
पिता और पुत्र का बंधन, इस कायनात का अनूठा श्रृंगार है।
ना कोई इकरार है यहाँ, ना इज़हार की दरकार है,
यह वो मौन रिश्ता है, जिसमें बस त्याग और उपहार है।
पिता ने तोड़े अपने शौक सारे, बस एक मुस्कान के वास्ते,
चलते-चलते छाले पड़े पैरों पर, पर आसान किए बेटे के रास्ते।
जो खुद भूखा सोया हो कभी, वो निवाला मुँह में खिलाता है,
एक बाप ही है, जो अपनी हार में भी, बेटे की जीत मनाता है।
अब वक्त का पहिया घूमा है, कुछ नए अंदाज़ आए हैं,
बेटे के मजबूत कंधों पर, अब पिता के साए आए हैं।
जब कांपते हाथों को थामता है वो बेटा प्यार से,
तो झलकता है अक्स पुराना, उसी अटूट दुलार से।
पीढ़ी दर पीढ़ी चलती ये रीत है,
जहाँ हर हार में भी, एक अनोखी जीत है।

— धर्मेन्द्र शर्मा

धर्मेन्द्र शर्मा

धर्मेन्द्र शर्मा - परिचय जन्म स्थान: ग्राम रानपुर (अंबाह, मुरैना, मध्य प्रदेश) माता-पिता: श्रीमती सोमवती जी और श्री कृष्ण शर्मा शिक्षा: बी.एससी. नर्सिंग, एम.एससी. (रसायन विज्ञान), डी.सी.ए. और वर्तमान में एम.एससी. (जूलॉजी) में अध्ययनरत। प्रमुख रचनाएँ: काव्य-संग्रह: ‘ख़ामोशी के अल्फ़ाज़’ उपन्यास एवं कहानियाँ: ‘भाई फिर बटवारा क्यों?’, ‘वैश्या ही चरित्रहीन क्यों?’, ‘भाई मुझे तुम पर भरोसा है’, ‘4 साल 230 दिन’, और ‘अधूरी मोहब्बत की दास्तान’। विशेषता: ग्रामीण परिवेश, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों की सशक्त अभिव्यक्ति। M= 90391 04716