गीत/नवगीत

मेरा देश

गंगा , गीता, गायत्री, गाय, मेरा देश।
सिद्ध मंत्रों के रचे अध्याय, मेरा देश।

दानवों से लड़े, जीते, मुक्ति के संग्राम,
अग्निधारा में नहाकर, मन हुआ निष्काम,
देवता सम पूज्य जड़ – चेतन प्रकृति के अंश,
पृथ्वी माता, पुत्र हम, पर्याय मेरा देश।

विषबुझी पछुआ हवाएँ, घोलती उन्माद,
सूर्य – किरणें प्रखरता से, कर रहीं संवाद,
विभाजन की त्रासदी झेली, सहे अपघात,
अतिवाद के सम्मुख नहीं, असहाय मेरा देश।

धर्म – बल से तोड़ डाले, क्रूरता के पंख,
युद्ध में हमने सदा फूँके, विजय के शंख,
घिरे सिर पर, कब टिके आतंक के बादल,
विश्व – शांति के खोजता, उपाय मेरा देश।

भू से नभ तक ध्वज तिरंगा, पा रहा सम्मान,
भारतीयों के अधर पर वंदेमातरम् गान,
विविधता में एकता संस्कृति की चिर पहचान,
‘वसुधा ही कुटुम्ब है ‘ अभिप्राय मेरा देश।

— गौरीशंकर वैश्य विनम्र

*गौरीशंकर वैश्य विनम्र

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