मुक्तक/दोहा

कहती हमसे राखियाँ

चिट्ठी लाई गाँव से, जब राखी उपहार।
आँसू छलके आँख से, देख बहन का प्यार।।

रेशम की डोरी सजी, लेकर नेह अपार।
बहना के विश्वास का, भाई है आधार।।

रक्षा बंधन प्रेम का, हृदय का त्योहार।
इसमें बसती द्रौपदी, है कान्हा का प्यार।।

कहती हमसे राखियाँ, तुच्छ सभी स्वार्थ।
बहनों की शुभकामना, जीवन करे सिधार्थ।।

भाई-बहना नेह के, रिश्तों के आधार।
इस धागे के सामने, सब कुछ है बेकार।।

बहना मूरत प्यार की, माँगे ये वरदान।
भाई को यश-बल मिले, बढ़े सदा सम्मान।।

दूर देश में हो भले, भाई अपना यार।
राखी लेकर लौटती, बचपन की झंकार।।

बचपन जुड़ी शरारतें, आँगन की मुस्कान।
राखी आते ही जगे, भूली हर पहचान।।

थाली में रोली सजी, दीपक ज्योति अपार।
बहना तिलक लगा कहे, रहना तुम खुशहाल।।

माँ की ममता-सी लगे, बहना का व्यवहार।
उसके मन की कामना, भाई का संसार।।

राखी बंधन बस नहीं, इसमें स्नेह महान।
जोड़ रही है आज भी, रिश्तों की पहचान।।

सुख में हँसना साथ में, दुख में बनना ढाल।
भाई-बहना का यही, रिश्ता है खुशहाल।।

धन-दौलत सब क्षणिक हैं, रिश्ते हैं अनमोल।
राखी बाँधे प्रेम से, खुल जाए मन मोल।।

मन में यदि हो प्रेम तो, दूरी हो निस्प्रभाव।
राखी के इस पर्व मिट, जाए सभी दुराव।।

बहना के आशीष से, खिल उठता परिवार।
उसकी हँसी में बसे, खुशियों का संसार।।

रिश्तों में सम्मान हो, मन में निर्मल भाव।
रक्षा बंधन दे सदा, प्रेम-स्नेह का चाव।।

सब बहनों पर यदि करें, मन से सच्चा गर्व।
होता तब ही मानिए, रक्षा बंधन पर्व।।

— डॉ. प्रियंका ‘सौरभ’

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh