कविता

कविता

अपने क्रोध को जो हर ले,वही जीवन का नेता है

दुनिया को जीतना आसान,खुद को जीतना कठिन है,
मन के भीतर छिपा अहं ही सबसे बड़ा रण है।
जो झुककर भी मुस्कुरा दे,वही सच्चा विजेता है,
अपने क्रोध को जो हर ले,वही जीवन का नेता है।

ताज मिले या तालियाँ,ये जीत अधूरी रहती है,
जब तक मन की जिद भीतर चुपचाप खड़ी रहती है।
जो ‘मैं’ को मिटाकर ‘हम’ का दीप जलाता है,
वही रिश्तों में सच्चा प्रेम और सम्मान पाता है।

ऊँचा उठना हो तो पहले मन को सरल बनाओ,
दर्पण में दूसरों को नहीं,अपना चेहरा देख पाओ।
दोष गिनाने से पहले अपनी भूल स्वीकार करो,
अहंकार की हर दीवार को विनम्रता से पार करो।

जिसने स्वयं पर शासन करना सीख लिया है,
उसने जीवन का सबसे बड़ा रहस्य जीत लिया है।
न क्रोध उसे बाँध सके,न अभिमान झुका पाए,
वह विपरीत हवाओं में भी मुस्कुराता जाए।

जीवन की सबसे बड़ी जीत किसी पर अधिकार नहीं,
किसी को हराना भी सच्ची सफलता का आधार नहीं।
किशन जो अपने अहं को हराकर प्रेम का दीप जलाता है,
वही अपने जीवन को सच में जीत जाता है।

— किशन सनमुखदास भावनानी

*किशन भावनानी

कर विशेषज्ञ एड., गोंदिया