मुक्तक/दोहा

चोर रहेगा चोर ही

रातों में जो शब्द जगे, भोर हुआ ये काम।
मेरी रचना ले गए, अपना कहकर नाम॥

भावों की मैं खोज में, खुद से करता बात।
वह तो कॉपी ढूँढ़ता, करे पेस्ट जज्बात॥

मेहनत मेरी, दर्द सँग, मेरी लेखन धार।
मेरी कविता ले सजा, फ़ेसबुके दरबार॥

शब्दों में जो प्राण थे, मेरे उसमें प्राण।
आईडी लटका रहे, मारे कॉपी-बाण॥

शब्दों की कीमत नहीं, ऐसा था बाज़ार।
देखा, मेरी लेखनी, से चलता है व्यापार॥

लिखना जिनको था नहीं, अब साहित्यकार।
दूजों की मेहनत उठा, बनते फिर हुशियार॥

शिकवा मुझको है नहीं, बस इतना रख ध्यान।
कविता चोरी से कभी, कवि न बनता महान॥

चोरी की पहचान बस, झूठ-मूठ का गान।
चोर रहेगा चोर ही, भले मिले सम्मान॥

मेरी स्याही, लेखनी, मेरी रातें, पीर।
तुम बस अपना नाम लिख, खुश कर लो तकदीर॥

लेखक अपनी लेखनी, जान सके हर बार।
उसको किसी प्रमाण की, होती कब दरकार॥

शब्द चुराओगे मगर, चुरा न पाओ जान।
रचना में जो आत्म है, लेखक की पहचान॥

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh