कविता

धागों का यह बंधन न टूटे अटल रहे

राखी भाई बहन के प्यार का अनूठा है बंधन
जो बड़ी धूमधाम से हर वर्ष मनाया है जाता
बहुत दूर भी रहते हो भाई बहन
मगर धागे से बंधा प्यार एक संदेश है लाता

बचपन में खेलते खेलते किसी
बात पर हो जाती थी तकरार
इक दूजे के बिना नहीं रह पाते थे
आपस में था बहुत प्यार

बचपन के राक्षबन्धन के होते थे अजब नज़ारे
उस दिन भाई ही लगते हैं सब बहनों को प्यारे
कितने भी पिटे हों या पीटे हों बच्चपन में
गले लगती हैं बहनें भूल कर शिकवे सारे

झूठ बोल कर जब बहन पापा से पिटवाती थी
जब रोते थे तो चुप करवाने खुद ही आ जाती थी
लेकिन राखी वाले दिन बड़े प्यार से बुलाती थी
कुमकुम अक्षत और फूल का टीका माथे पर लगाती थी

कलाई पर राखी बांध कर हमको मिठाई खिलाती थी
शादी के बाद अब कभी कभी ही है आ पाती
याद बहुत करती है अपने भाई को
हर वर्ष रक्षा बंधन पर राखी जरूर है भिजवाती

राखी को देख कर वो बचपन है याद आता
जब भाई रक्षाबंधन को बहन को था बुलाता
भाई और बहिन का आज का नहीं
यह तो जन्मों जन्मों का है नाता

ज़माने के साथ बदल गया इसको मनाने का ढंग
अब तो राखियों के आ गए हैं बाजार में कई रंग
जहां राखी पहले होती थी कच्चा धागा हाथ से बनाया
अब तो राखियों की कीमतें देख कर रह जाते सब दंग

अब राखियां कई रंगों की कई डिजाइनों में है मिलती
कोई दस कोई बीस की कोई हज़ारों की है बिकती
राखी की कीमत से क्या लेना खुश रहे सारा संसार
धागों का यह बंधन टूटे न अटल रहे भाई बहन का प्यार

— रविंदर कुमार शर्मा

*रवींद्र कुमार शर्मा

घुमारवीं जिला बिलासपुर हि प्र