ग़ज़ल
मुड़ के पीछे न इक नज़र देखा
दाँव अपना जो बे असर देखा
कथनी करनी में फ़र्क हो जिनकी
उनका भाषण डगर मगर देखा
मयक़दे की तरफ़ बढ़े जब पग
ग़ौर से तब इधर उधर देखा
वक्त करवट बदल रहा हर दिन
ज़ेर को आज फिर ज़बर देखा
आम जन की खबर नहीं लेती
आज सत्ता को बे खबर देखा
अहमियत आब की तभी जानी
सूखता जब कहीं शजर देखा
— हमीद कानपुरी
