डिजिटल युग में कुटुम्ब- प्रबोधन की बढ़ती आवश्यकता
मानव सभ्यता के विकास की यात्रा में परिवार वह प्राचीनतम संस्था है, जिसने व्यक्ति को केवल जन्म ही नहीं दिया, बल्कि उसे संस्कार, भाषा, मूल्य और जीवन-दृष्टि भी प्रदान की। आज हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं, जहाँ हथेली में समाया स्मार्टफोन पूरी दुनिया से जुड़ने का माध्यम बन गया है। सूचना की गति प्रकाश से होड़ ले रही है, किन्तु विडम्बना यह है कि एक ही छत के नीचे रहने वाले लोग एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। भोजन की मेज पर चार लोग बैठे हैं, पर चारों की दृष्टि अपनी-अपनी स्क्रीन पर है। दादी की कहानियाँ मोबाइल की रील्स में खो गई हैं और माता-पिता का स्नेहिल स्पर्श नोटिफिकेशन की घंटियों से हार रहा है।
ऐसे समय में “कुटुम्ब- प्रबोधन” केवल एक सामाजिक विचार नहीं, बल्कि समय की अनिवार्य पुकार बन गया है। यह वह जागरण है जो परिवार को पुनः संवाद, संस्कार और सहअस्तित्व के सूत्र में पिरोता है। तकनीक की प्रगति से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है, किन्तु उसके प्रति सजग और विवेकशील होना आवश्यक है।
कुटुम्ब – प्रबोधन का अर्थ
‘कुटुम्ब’ शब्द का अर्थ है वह समूह जो रक्त, स्नेह और दायित्व के बन्धन से जुड़ा हो। ‘प्रबोधन’ का अर्थ है जागृत करना, चेतना जगाना, सही दिशा का बोध कराना। इस प्रकार कुटुम्ब- प्रबोधन का आशय है – परिवार के सभी सदस्यों में अपने दायित्वों, मूल्यों और पारस्परिक सम्बन्धों के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना तथा परिवार को संस्कारों का जीवन्त केन्द्र बनाए रखना।
कुटुम्ब- प्रबोधन के अन्तर्गत नियमित पारिवारिक संवाद, साथ बैठकर भोजन, पर्व-त्योहारों का सामूहिक आयोजन, भजन-कीर्तन या प्रार्थना, बड़ों का सम्मान, बच्चों के साथ समय बिताना और परम्पराओं का हस्तान्तरण जैसी गतिविधियाँ सम्मिलित हैं। यह एक ऐसी सतत प्रक्रिया है, जिसमें परिवार स्वयं अपने भीतर झाँकता है, अपनी कमियों को पहचानता है और उन्हें सुधारने का संकल्प लेता है।
परिवार संस्था का महत्व
भारतीय संस्कृति में परिवार को समाज की मूल इकाई माना गया है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” का उद्घोष इस बात का प्रमाण है कि हमने सम्पूर्ण विश्व को भी परिवार के रूप में देखा। परिवार का महत्व अनेक स्तरों पर दृष्टिगोचर होता है।
प्रथम पाठशाला:
बच्चे की पहली शिक्षा परिवार में ही होती है। माँ की लोरी से लेकर पिता के आचरण तक, हर बात उसके व्यक्तित्व की नींव रखती है। चरित्र-निर्माण की जो कार्यशाला परिवार में चलती है, उसका विकल्प कोई विद्यालय या संस्थान नहीं हो सकता।
भावनात्मक सुरक्षा कवच:
जीवन के संघर्षों, असफलताओं और संकटों में परिवार व्यक्ति को वह सम्बल देता है जो किसी अन्य स्रोत से नहीं मिलता। यही कारण है कि जिन व्यक्तियों को पारिवारिक सहयोग प्राप्त होता है, वे तनाव और अवसाद का अधिक सफलतापूर्वक सामना कर पाते हैं।
संस्कृति का वाहक:
भाषा, लोकगीत, रीति-रिवाज, पर्व-परम्पराएँ और जीवन-मूल्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिवार के माध्यम से ही आगे बढ़ते हैं। दादी-नानी की कहानियाँ केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि नैतिक शिक्षा के सर्वोत्तम साधन रही हैं।
सामाजिक अनुशासन की इकाई:
सहनशीलता, त्याग, सहयोग, उत्तरदायित्व और सामंजस्य जैसे गुण व्यक्ति परिवार में ही सीखता है। एक सुदृढ़ परिवार ही सुदृढ़ समाज और सशक्त राष्ट्र की आधारशिला है।
परिवार विखण्डन के कारण
आज परिवार संस्था अनेक दबावों से गुज़र रही है। संयुक्त परिवार टूटकर एकल परिवारों में बदल गए हैं और अब एकल परिवार भी भीतर से बिखरते दिखाई देते हैं। इसके पीछे कई कारण हैं।
- आर्थिक एवं भौतिकवादी दृष्टिकोण:
उपभोक्तावादी संस्कृति ने सफलता का पैमाना धन और सुविधा को बना दिया है। अधिक कमाने की दौड़ में माता-पिता के पास बच्चों के लिए समय नहीं बचा। सम्बन्धों का मूल्य भावनाओं से नहीं, उपयोगिता से आँका जाने लगा है।
- रोजगार हेतु पलायन: शिक्षा और आजीविका के लिए युवाओं का गाँव से शहर और देश से विदेश जाना स्वाभाविक है, किन्तु इससे परिवार भौगोलिक रूप से बिखर जाते हैं और बुज़ुर्ग अकेलेपन का शिकार होते हैं।
- व्यक्तिवाद की प्रबलता:
“मेरी निजता”, “मेरा स्पेस”, “मेरी आज़ादी” जैसे विचार जब सीमा से अधिक बढ़ते हैं तो “हम” की भावना क्षीण हो जाती है। अधिकारों की चर्चा बढ़ती है और कर्तव्यों की उपेक्षा होती है।
- पाश्चात्य जीवन-शैली का अन्धानुकरण:
बिना विवेक के अपनाई गई विदेशी जीवन-पद्धतियाँ हमारे पारिवारिक ढाँचे के अनुकूल नहीं हैं। भोग-प्रधान दृष्टि ने त्याग और समर्पण के भाव को कमज़ोर किया है।
- डिजिटल माध्यमों की अति:
सोशल मीडिया, आनलाइन गेमिंग, ओटीटी प्लेटफार्म और अन्तहीन स्क्रालिंग ने परिवार के सदस्यों का समय और ध्यान दोनों छीन लिए हैं। आभासी दुनिया के सैकड़ों ‘मित्र’ हैं, किन्तु पास बैठे परिजन से बात करने की फ़ुर्सत नहीं।
- सहनशीलता और संवाद का अभाव:
छोटी-छोटी बातों पर टकराव, अहं का प्रश्न और समझौते की अनिच्छा पारिवारिक कलह को जन्म देती है, जो अन्ततः विघटन तक पहुँच जाती है।
कुटुम्ब – प्रबोधन की चुनौतियाँ
डिजिटल क्रान्ति ने जहाँ अनेक सुविधाएँ दी हैं, वहीं परिवार के समक्ष नई चुनौतियाँ भी खड़ी की हैं।
1.स्क्रीन की लत: बच्चे ही नहीं, बड़े भी मोबाइल के आदी होते जा रहे हैं। छोटे बच्चों को शान्त करने के लिए मोबाइल थमा देना अब आम चलन है, जिससे उनके मानसिक, भाषायी और सामाजिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
2.इण्टरनेट पर हिंसा, अश्लीलता और भ्रामक सूचनाओं की बाढ़ है। बिना मार्गदर्शन के किशोर इनके सम्पर्क में आकर दिशाहीन हो सकते हैं तथा वे पारिवारिक संस्कारों और अनुशासन से कट जाते हैं।
3.बच्चे परिवार के सदस्यों से छिपकर साइबर बुलिंग, ठगी, नशाखोरी, पहचान की चोरी और ब्लैकमेलिंग जैसे खतरों में फँस जाते हैं तथा ऐसी गतिविधियाँ बहुत बाद में पता चलती हैं, जिससे परिवारों को मानसिक रूप से आहत होना पड़ता हैं।परिवार को सामाजिक बदनामी और आर्थिक क्षति उठानी पड़ती है।
- सोशल मीडिया पर दूसरों के सजे-सँवरे जीवन को देखकर युवा हीनभावना, ईर्ष्या और असन्तोष से ग्रस्त हो जाते हैं। ‘लाइक’ और ‘फालोअर’ आत्म-मूल्य का मापदण्ड बनते जा रहे हैं।इससे वे सामाजिकता से दूर हो रहे है। 5.तरुण एवं युवाओं में अनिद्रा, चिड़चिड़ापन, अकेलापन, एकाग्रता में कमी, चिन्ता और अवसाद जैसी समस्याएँ अत्यधिक स्क्रीन-समय से जुड़ी पाई जा रही हैं।
- औपचारिक ‘गुड मॉर्निंग’ संदेशों,एआई निर्मित वीडियो और इमोजी ने भावनाओं की गहराई को स्थानापन्न कर दिया है। शब्दों के पीछे का स्नेह, स्वर की कोमलता और आँखों की भाषा डिजिटल संवाद में लुप्त हो जाती है।
पीढ़ियों के बीच बढ़ती संवादहीनता और उसका प्रभाव
1.आज सबसे गम्भीर संकट यह है कि घर में तीन-तीन पीढ़ियाँ साथ रहकर भी अलग-अलग संसारों में जी रही हैं। बड़े – बुजुर्ग तकनीक से अनभिज्ञ होकर स्वयं को उपेक्षित महसूस करते हैं, माता-पिता कार्य और कर्तव्यों के बोझ तले दबे हैं और बच्चे अपनी आभासी दुनिया में मग्न हैं। यह ‘जनरेशन गैप’ (पीढ़ी – अंतराल) अब ‘कम्युनिकेशन गैप’ (संचार- अंतराल) में बदल चुका है।
- संवाद के अभाव में संशय जन्म लेते हैं। बच्चे अपनी समस्याएँ माता-पिता से साझा नहीं करते और समाधान के लिए इण्टरनेट या अनुचित संगति की ओर मुड़ जाते हैं। माता-पिता को पता ही नहीं चलता कि उनका किशोर किस मानसिक द्वन्द्व से गुजर रहा है। पति-पत्नी के बीच भी संवाद घटने से दूरियाँ बढ़ती हैं।
- जिन वृद्धजन के पास अनुभव का अपार भण्डार है, वे अकेलेपन और उपेक्षा से पीड़ित हैं। उनकी ज्ञान-सम्पदा अगली पीढ़ी तक पहुँच ही नहीं पाती। यह केवल उनकी व्यक्तिगत क्षति नहीं, सांस्कृतिक क्षति भी है।
- जिन बच्चों को परिवार में भावनात्मक संवाद नहीं मिलता, उनमें असुरक्षा, आक्रामकता, आत्मविश्वास की कमी और एकाकीपन देखा जाता है। मूल्यों की शिक्षा के अभाव में वे नैतिक द्वन्द्व की स्थिति में सही-गलत का निर्णय नहीं कर पाते।
- जब परिवार संस्कार देने में असमर्थ होते हैं तो सदस्यों में असहिष्णुता, हिंसा, नशाखोरी, अपराध और आत्महत्या की प्रवृत्तियाँ बढ़ती हैं। वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या इस सामाजिक विघटन का मौन साक्ष्य है। संवेदनहीन नागरिकों से भरा समाज कभी सशक्त राष्ट्र नहीं बना सकता।
बच्चों में डिजिटल अनुशासन, संस्कार तथा नैतिक विकास के उपाय
समस्या गम्भीर अवश्य है, किन्तु उसका समाधान कुटुम्ब – प्रबोधन के भीतर ही निहित है। बच्चों से संबंधित कुछ व्यावहारिक उपाय इस प्रकार हैं:
- स्वयं आदर्श बनें: बच्चे उपदेश से नहीं, अनुकरण से सीखते हैं। यदि माता-पिता स्वयं भोजन के समय मोबाइल या टीवी देखते रहेंगे, तो बच्चों से अनुशासन की अपेक्षा व्यर्थ है। परिवार के बड़ों को पहले अपना डिजिटल आचरण सुधारना होगा।
2.’नो-स्क्रीन जोन’ और ‘नो-स्क्रीन टाइम’:
भोजन की मेज, पूजा-स्थल, शयन-कक्ष और पारिवारिक वार्तालाप के समय को डिजिटल उपकरणों से मुक्त रखा जाए। सप्ताह में एक दिन ‘डिजिटल उपवास’ का प्रयोग भी अत्यन्त लाभकारी हो सकता है।
- स्क्रीन-समय की स्पष्ट सीमा:
आयु के अनुसार स्क्रीन-समय निर्धारित किया जाए और उसे दण्ड के रूप में नहीं, परिवार के नियम के रूप में सभी पर समान रूप से लागू किया जाए।
4.वैकल्पिक सार्थक गतिविधियाँ: खेल, संगीत, चित्रकला, पुस्तक-पठन, बागवानी, योग, पारिवारिक यात्राएँ और सेवा-कार्य बच्चों को स्क्रीन से हटाकर रचनात्मकता की ओर ले जाते हैं। केवल ‘मत करो’ कहने के बजाय ‘यह करो’ का विकल्प देना अधिक प्रभावी है।अभिभावक भी बच्चों के साथ उनकी गतिविधियों में सम्मिलित हों अथवा निगरानी करें।
5.. साप्ताहिक पारिवारिक बैठक:
सप्ताह में एक बार पूरा परिवार साथ बैठकर बातचीत करे, जिसमें सभी अपनी बात कहें, सफलताओं की सराहना हो और समस्याओं पर खुलकर चर्चा हो। भजन, प्रार्थना या सामूहिक पाठ इस बैठक को आध्यात्मिक आधार दे सकते हैं।
6.संस्कारों का जीवन्त हस्तान्तरण:
रामायण, महाभारत, पंचतन्त्र, महापुरुषों की जीवनियाँ और लोककथाएँ बच्चों को सुनाई जाएँ। पर्व-त्योहारों के पीछे की भावना और महत्व समझाया जाए। प्रातःकाल बड़ों को चरण स्पर्श एवं प्रणाम, सन्ध्या-वन्दन और कृतज्ञता-भाव जैसी छोटी आदतें बड़े संस्कार बनती हैं।
7.. डिजिटल साक्षरता और विवेक:
बच्चों को यह सिखाया जाए कि इण्टरनेट पर क्या देखना उचित है, किस सूचना पर विश्वास करें, अपनी निजी जानकारी कैसे सुरक्षित रखें और किसी भी संकट की स्थिति में माता-पिता को निःसंकोच बताएँ। भय का वातावरण नहीं, विश्वास का वातावरण बनाया जाए, ताकि बच्चा गलती होने पर भी सच बता सके।
- बुजुर्गों की सहभागिता:
दादा-दादी को बच्चों के जीवन का सक्रिय हिस्सा बनाया जाए। वे कहानी सुनाएँ, परम्पराएँ सिखाएँ। बड़े – बुजुर्ग बच्चों को प्रातः काल टहलने और अवकाश में पार्क में खेलने के लिए ले जाएँ। बच्चे बुजुर्गों को तकनीकी ज्ञान कराएँ।
यह दोतरफा सीख पीढ़ियों के बीच आत्मीय पुल का निर्माण करती है।
- सराहना और भावनात्मक जुड़ाव:
बच्चे जब अपने अच्छे कार्यों पर प्रशंसा और घर में स्नेह पाते हैं, तो उन्हें बाहरी मान्यता के लिए सोशल मीडिया पर भटकना नहीं पड़ता। भावनात्मक रूप से तृप्त बच्चा आभासी दुनिया का कम शिकार होता है।
तकनीक सम्बन्धों का विकल्प नहीं, सेतु बने
यह स्वीकार करना होगा कि तकनीक अपने आप में न अच्छी है, न बुरी; वह एक साधन है। उसका परिणाम इस पर निर्भर करता है कि हम उसका उपयोग किस प्रकार करते हैं। वही मोबाइल जो परिवार में दरार डाल सकता है, वह हजारों किलोमीटर दूर बैठे माता-पिता को बच्चों से जोड़ भी सकता है।
विदेश में पढ़ रही संतान से वीडियो काल पर बात करना, परिवार के व्हाट्सएप समूह में पर्व की शुभकामनाएँ बाँटना, बुज़ुर्गों को भजन-प्रवचन सुनाना, बच्चों को शैक्षिक ऐप्स से सिखाना, पुरानी पारिवारिक तस्वीरों और वीडियो को डिजिटल रूप में सँजोना, ये सब तकनीक के सकारात्मक उपयोग हैं। आवश्यकता केवल इस बात की है कि तकनीक हमारी स्वामी न बने, हम उसके स्वामी रहें।
एक वीडियो काल उपस्थिति की अनुभूति दे सकती है, पर माँ के हाथ का स्पर्श, पिता का कन्धे पर हाथ रखकर कहना कि “मैं हूँ न”, दादी की गोद की ऊष्मा, इनका कोई डिजिटल विकल्प नहीं। इसलिए तकनीक का उद्देश्य यह होना चाहिए कि वह परिवार – मिलन की सम्भावनाएँ बढ़ाए, मिलन का स्थान न ले। जब हम ‘आनलाइन’ और ‘आफलाइन’ जीवन में सन्तुलन साध लेंगे, तब तकनीक वरदान सिद्ध होगी।
सन्तुलन के लिए तकनीक का उपयोग आवश्यकता के लिए हो, आदत के लिए नहीं; पहले साक्षात् संवाद, फिर डिजिटल संवाद; और परिवार के साथ बिताया गया समय सर्वोच्च प्राथमिकता हो।
कुटुम्ब – प्रबोधन में समाज और संगठनों की भूमिका
कुटुम्ब प्रबोधन केवल परिवारों का आन्तरिक दायित्व नहीं है। विद्यालयों, धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं, मीडिया और सामुदायिक संगठनों को भी इसमें योगदान देना चाहिए।
अभिभावक-शिक्षक संवाद, पारिवारिक कार्यशालाएँ, संस्कार-केन्द्र, बाल-संस्कार शिविर, वरिष्ठ नागरिक मिलन और सामूहिक पर्वोत्सव जैसे आयोजन परिवारों को परस्पर जोड़ने और जागरूक करने का कार्य कर सकते हैं। मीडिया और सामग्री-निर्माताओं का भी दायित्व है कि वे पारिवारिक मूल्यों को क्षीण करने वाली नहीं, उन्हें पुष्ट करने वाली सामग्री प्रस्तुत करें।
परिवार वह बगीचा है, जहाँ संस्कारों के पौधे रोपे और सींचे जाते हैं। डिजिटल युग की आँधी में यदि हमने इस बगीचे की देखभाल न की, तो भविष्य की पीढ़ियाँ जड़ों से कटे वृक्षों के समान होंगी, ऊँची दिखने वाली पर खोखली। इसलिए कुटुम्ब – प्रबोधन आज की सबसे बड़ी आवश्यकताओं में से एक है।
हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम अपने घर को केवल ‘वाई-फाई जोन’ नहीं, ‘संस्कार-जोन’ बनाएँगे; मोबाइल की स्क्रीन से अधिक अपनों की आँखों में झाँकेंगे; और बच्चों को केवल स्मार्ट नहीं, संवेदनशील, संस्कारित और सुशील भी बनाएँगे। जब माता-पिता आदर्श बनेंगे, बुजुर्ग मार्गदर्शक बनेंगे, बच्चे जिज्ञासु और विनम्र बनेंगे और तकनीक एक सेतु की भूमिका निभाएगी, तभी हम एक ऐसे समाज की रचना कर सकेंगे, जो आधुनिक भी हो और अपनी जड़ों से जुड़ा भी।
अन्ततः, जीवन की सबसे बड़ी पूँजी न धन है, न तकनीक, बल्कि वे अपने हैं, जो हमारे सुख-दुख में साथ खड़े रहते हैं। इस पूँजी को सहेजना ही कुटुम्ब – प्रबोधन का सार है। आइए, हम सब मिलकर परिवार को पुनः संवाद, स्नेह और संस्कार का तीर्थ बनाएँ, क्योंकि सशक्त परिवार से ही सशक्त समाज और सशक्त राष्ट्र का निर्माण सम्भव है।
— गौरीशंकर वैश्य विनम्र
