बेपरवाह
अमूमन दिसंबर की अंतिम रात कई इंसान अपने गंतव्य की ओर भागते नजर आते हैं, नववर्ष पर मस्ती के लिए तय प्रोग्राम होता है। कोई रेल से, कोई प्लेन से, कोई सड़क के रास्ते। यूँ तो बदलते वर्ष की गहमागहमी में कोई इन बातों पर ध्यान नहीं देता, जब तक कोई अनहोनी न घट जाए।
इकत्तीस दिसंबर की रात तेज संगीत बजाती एक काली एसयूवी बड़ी तेजी से सड़कों पर भागी जा रही थी, उसमें किशोरावस्था लाँघकर कर युवावस्था में प्रवेश करते बच्चे सवार थे। नए वर्ष के लिए उन्हें पहली जनवरी की सुबह गंतव्य तक पहुँचना था। लंबे सफर में उनींदापन हावी होने लगा। सुस्ती भगाने के लिए फैसला किया, “दो-दो पैग मार लिए जाएँ, अगर कहीं रुकने की सोची तो सुबह सवेरे तक पहुँच नहीं पाएँगे। पहली जनवरी पर दिन भर पार्टी, लौटना भी तो है। क्लासेस फिर कुछ समय के बाद एग्जाम्स। कहीं रुके, तो पूरा प्रोग्राम चौपट।” ड्राइविंग सीट पर बच्चे बदल रहे थे, गाड़ी लगभग सौ के स्पीड में भागी जा रही थी।
उनके स्पीड से भयभीत चारों में से एक ने रोकने का प्रयास किया और न सुने जाने पर पीछे सीट-बेल्ट लगा दम साधकर कर बैठ गया। वैसे भी तीनों उसे फट्टू कहते थे। आधी रात से अधिक बीत चुकी थी, इंद्रियों पर नियंत्रण खत्म होने लगा था, साथ ही साथ गाड़ी पर भी। शहर की सीमा में घुसने ही वाले थे, तभी अचानक से एक धमाका हुआ, उसके बाद निस्तब्धता सी छा गई।
एसयूवी सड़क के किनारे खड़े एक दस चक्का ट्रक के नीचे जा घुसी थी। पौ फट रही थी, सड़क पर कुछ ही गिने चुने लोग थे, उस ओर दौड़ पड़े। एसयूवी का पूरा अगला हिस्सा ट्रक में जा फँसा था। दुर्घटना की भयावहता से उन्हें सकारात्मक उम्मीद तो न थी, बस जागरूक नागरिक का कर्तव्य था। तीन साँसे थम चुकी थीं, पर पिछली सीट पर एक कराह रहा था। कुछ बुदबुदा भी रहा था, “रोका था मैंने इन्हें…” आगे के शब्द अस्पष्ट होते गए और वह बेहोश हो गया। पुलिस, एंबुलेंस, हाइवे पेट्रॉल खबर मिलते ही आनन-फानन में दौड़ पड़े।
बच्चे अलग-अलग शहरों के थे। परिजनों को दुर्घटना की खबर दी गई, मौत की नहीं। वे रोते बिलखते अस्पताल में एकत्रित हुए। उनके बीच जो भी संक्षिप्त वार्ता हुई, पता चला कि बच्चों के इस नाइट ड्राइव प्रोग्राम की उन्हें जानकारी नहीं थी। जानते तो शायद रोकने का प्रयास करते। पर अब बच्चे सुनते कहाँ हैं।
इन अकल्पनीय परिस्थितियों में अपने प्राणविहीन बच्चों को देखना- आऽहहह! उन्हें अपनी साँसे बोझ लगने लगीं। हृदय में मर्मांतक मरोड़ें उठने लगीं, “ईश्वर हमें ही ले जाता, बच्चों को जीवनदान दे देता”, तड़पती माताओं के अस्फुट स्वर थे। सिर्फ एक ही बचा, वह भी इस हाल में कि ठीक होने की विषय में डॉक्टर महीनों बताते।
जाने वाले चले गए पर प्रश्न छोड़ गए, “तनिक देर से पहुँचते तो क्या बिगड़ जाता? स्पीड का यह कैसा जुनून है कि इंसान गंतव्य पर पहुँचने के स्थान पर शून्य में विलीन हो जाता है, जहाँ से कभी कोई लौटकर नहीं आया।”
“बच्चों की अर्थी का बोझ कंधों पर नहीं, जन्मदाता के टीसते छलनी हृदय पर होता है। पथराए से जन्मदाता ताउम्र इस जानलेवा दर्द को ढोने को विवश होते हैं। जीवन बेशकीमती है और बेलगाम स्पीड कभी दूसरा मौका नहीं देती”, क्या कभी बच्चे, बड़े भी इस बात को समझ पायेंगे?
“गति स्वयं के लिए नहीं, दूसरों के लिए भी उतनी ही घातक है”, यह समझना-समझाना अपरिहार्य होता जा रहा है क्योंकि बेपरवाह वाहन चालकों की वजह से सड़क दुर्घटनाओं का ग्राफ निरंतर बढ़ता जा रहा है।
— नीना सिन्हा
