कुँआरी हथेलियाँ
आज वह अर्थी पर लेटी थी। दोनों हथेलियाँ खाली थीं। छोटी ननद ने जेठानी से कहा, “भाभी, सुहागन को दोनों हाथों में लड्डू देकर विदा करते हैं। घर में नहीं हैं तो किसी से मँगवा लो।” थोड़ी देर में लड्डू आ गए।
भीड़ में खड़ी एक स्त्री की नज़र उसकी हथेलियों पर ठिठक गई। अनायास उसके मुँह से निकला- “अरे… ये हथेलियाँ तो अब भी कुँआरी हैं। किसी ने इन्हें कभी चूमा तक नहीं।”
उसकी बात किसी ने नहीं सुनी। बस उसकी दोनों हथेलियों पर लड्डू रख दिए गए।
यमदूत ने संकेत किया, पर उसने विनम्रता से कुछ पल और माँग लिए। फिर अपनी ही अर्थी के साथ-साथ चल पड़ी।
चिता सज चुकी थी। उसे लगा, “अब ये हथेलियाँ भी बिना कभी प्रेम का स्पर्श पाए राख हो जाएँगी।“
कपाल-क्रिया के लिए दक्ष आगे बढ़ा। एक क्षण के लिए उसकी नज़र उन हथेलियों पर ठहर गई। उसने धीरे से दोनों हथेलियों से लड्डू हटाए, एक-एक हथेली को अपने होंठों से छुआ और उतनी ही सावधानी से लड्डू फिर वहीं रख दिए।
उसने एक बार अपनी हथेलियों को देखा… फिर यमदूत की ओर मुस्कराकर बढ़ गई।
— पूजा अग्निहोत्री
