कविता

दौर ए मशक्कत

उनका मशक्कत तो सिर्फ चुनावी समय में होता है,
जो जीत गए हंसे पांच साल
जनता तो रोने के लिए है इसलिए
पूरे पांच रोता है,
वादों की चादर ओढ़ कर वो,
फिर महलों में सो जाते हैं,
जो कल तक थे जनता के सेवक,
वो आज खुदा हो जाते हैं,
फरियादें लेकर चौखट पर,
जब आम आदमी जाता है,
पहचानने से भी इंकार मिले,
बस यही सिला वो पाता है,
सड़कें,बिजली और पानी के,
सपने जो कल दिखलाए थे,
वो सारे वादे टूट गए,
जो बड़े चाव से गाए थे,
पर याद रहे ऐ हुक्मरानों,
यह वक्त कभी रुकता नहीं,
जनता का यह जो सब्र है,
हर बार यूं ही झुकता नहीं,
फिर आएगा चुनावी मौसम,
फिर फैसला जनता करेगी,
इस दौर-ए-मशक्कत का बदला,
अपने एक वोट से लेगी।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554