विज्ञान

भारत में कृत्रिम मेधा के विकास में व्यावहारिक चुनौतियाँ

कृत्रिम मेधा, यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), आज दुनिया की सबसे तेज़ चलती तकनीकी दौड़ बन गई है। चैटबॉट से लेकर अस्पतालों तक और खेतों से लेकर बैंकों तक, हर जगह एआई की चर्चा है। भारत इस दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहता और उसके पास इसके हुनर भी हैं — दुनिया के सबसे बड़े सॉफ्टवेयर उद्योगों में एक, यूपीआई जैसी सरल डिजिटल सेवाएँ और तकनीक में रुचि रखने वाली युवा आबादी। भारत एआई शोध में भी दुनिया के अग्रणी देशों में गिना जाता है। सरकार ने मार्च 2024 में ‘इंडियाएआई मिशन’ शुरू किया, जिस पर 5 साल में 10,371 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इसका लक्ष्य साफ़ है — भारत में एआई बनाना और भारत के लिए एआई बनाना। इस मिशन के तहत कंप्यूट, डेटा, प्रतिभा, स्टार्टअप फंडिंग और सुरक्षित एआई जैसे कई खंभों पर पूरा ढाँचा खड़ा करने की बात की गई है। लेकिन सपना देखना एक बात है और उसे हकीकत में बदलना दूसरी। ज़मीनी स्तर पर भारत के सामने कई बड़ी और व्यावहारिक चुनौतियाँ खड़ी हैं। इन्हीं चुनौतियों को आइए सरल भाषा में समझते हैं।

सबसे पहली बाधा ‘कंप्यूट की किल्लत’ : एआई के बड़े मॉडल बनाने के लिए शक्तिशाली कंप्यूटर चाहिए, खासकर जीपीयू नाम के ख़ास चिप्स। अमेरिका और चीन की बड़ी कंपनियाँ हज़ारों-लाखों जीपीयू एक साथ चलाकर मॉडल तैयार करती हैं। इंडियाएआई मिशन के तहत भारत ने भी सार्वजनिक-निजी भागीदारी से 10,000 से ज़्यादा जीपीयू जुटाने की योजना बनाई, जिसे बाद में बढ़ाकर 18,000 से ऊपर कर दिया गया। यह कोशिश सराहनीय है, लेकिन दौड़ अभी लंबी है। असली दिक्कत यह है कि ये चिप्स भारत में नहीं बनते। हमें इन्हें बाहर से ख़रीदना पड़ता है और उनका निर्माण भी दुनिया की थोड़ी सी कंपनियों के हाथ में है। जब पूरी दुनिया में माँग बढ़ती है, तो कीमतें आसमान छूती हैं और आपूर्ति अनिश्चित हो जाती है। एडवांस चिप्स के निर्यात पर लगाई गई विदेशी पाबंदियाँ भी भविष्य में रुकावट बन सकती हैं। इसी समय भारत के डेटा सेंटरों की कुल क्षमता बहुत सीमित है। सीधे शब्दों में, जिस ईंधन के बिना एआई का इंजन नहीं चलता — यानी कंप्यूट — वह भारत के लिए अभी महँगा और दुर्लभ है।

छिपी हुई चुनौती ‘बिजली और पानी’: एआई सिर्फ़ चिप्स नहीं चलाता, बिजली और पानी भी ख़ाता है। बड़े डेटा सेंटर दिन-रात ठंडे रहने के लिए भारी मात्रा में बिजली और पानी इस्तेमाल करते हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 में साफ़ कहा गया है कि भारत में बिजली, पूँजी और पानी एआई के विस्तार के रास्ते की बड़ी बाधाएँ हैं। एक तरफ़ घरों, खेतों और कारखानों को बिजली चाहिए, दूसरी तरफ़ डेटा सेंटरों की भूख भी लगातार बढ़ रही है। ऐसे में तय करना पड़ेगा कि एआई के लिए संसाधन कितने, कहाँ और किस संयम से लगाने हैं। बिना सोचे-समझे विस्तार करने पर बिजली के बिल और पर्यावरण, दोनों पर बोझ पड़ेगा। यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत की ज़्यादातर बिजली अभी जीवाश्म ईंधन से बनती है, इसलिए बिना योजना के बढ़ाए गए डेटा सेंटर जलवायु पर भी असर डाल सकते हैं।

सैकड़ों भाषाओं का देश, पर डेटा की कमी : भारत 22 अनुसूचित भाषाओं और सैकड़ों बोलियों का देश है। यही हमारी ख़ूबसूरती है, लेकिन एआई के लिए यही सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती भी। एआई मॉडल उसी भाषा में अच्छा काम करता है, जिस भाषा में उसे ढेर सारा डेटा दिया जाता है। इंटरनेट पर अंग्रेज़ी की सामग्री भरी पड़ी है, पर भारतीय भाषाओं की सामग्री कुल मिलाकर 1 प्रतिशत से भी कम है। छोटी भाषाओं में साफ़-सुथरा और व्यवस्थित डेटा बहुत दुर्लभ है। नतीजा यह है कि भारतीय स्टार्टअप कभी-कभी मजबूरी में कृत्रिम (सिंथेटिक) डेटा पर मॉडल ट्रेन करते हैं। दूसरी तरफ़, भारतीयों का बहुत सारा डिजिटल डेटा विदेशी प्लेटफ़ॉर्मों के पास बंद पड़ा है। सरकार ‘भाषिनी’ जैसे प्रयासों से भारतीय भाषाओं में डेटा इकट्ठा कर रही है, लेकिन ज़रूरत इससे कहीं ज़्यादा है। अगर एआई को किसान की भाषा में बात करनी है, तो पहले उस भाषा का डेटा बनाना होगा।

प्रतिभा की भरमार, पर विशेषज्ञों की : भारत दुनिया के सबसे बड़े इंजीनियर उत्पादक देशों में से एक है और एआई-साक्षर कार्यबल के मामले में अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर आता है। एक अध्ययन के मुताबिक़ दुनिया की एआई प्रतिभा में भारतीयों की हिस्सेदारी लगभग 30 प्रतिशत तक है। फिर भी चुनौती असली है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि कोर एआई कौशल — यानी मॉडल बनाने वाले गहरे हुनर — में माँग और आपूर्ति का अंतर 51 प्रतिशत तक पहुँच चुका है। यानी जितने विशेषज्ञ चाहिए, उसके आधे से भी कम उपलब्ध हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि बड़े मॉडल बनाने का अनुभव ज़्यादातर उन लोगों के पास है, जो विदेश की बड़ी कंपनियों में काम कर चुके हैं। यह ज्ञान किताबों में नहीं मिलता, अनुभव से आता है। हमारी सबसे तेज़ दिमाग वाली प्रतिभा सालों से विदेश जा रही है। ऐसे में भारत को अनुभवी लोगों को वापस बुलाना और यहीं नए विशेषज्ञ तैयार करना — दोनों ज़रूरी हैं। इसके लिए पाठ्यक्रम बदलने होंगे और विश्वविद्यालयों-इंडस्ट्री के बीच का पुल मज़बूत करना होगा।

रिसर्च और पूँजी की कमी : किसी भी तकनीक की नींव रिसर्च है और यहीं भारत सबसे पीछे दिखता है। हमारा निजी क्षेत्र बुनियादी एआई रिसर्च में अमेरिका और चीन की तुलना में बहुत कम निवेश करता है। जनवरी 2025 में जब चीन की स्टार्टअप ‘डीपसीक’ ने कम खर्च में दुनिया के बेहतरीन मॉडल बना दिखाए, तो भारत में गहरी चिंता फैली कि हम इस दौड़ में कितने पीछे हैं। आईआईटी और भारतीय विज्ञान संस्थान जैसे संस्थानों में शानदार काम होता है, पर वह रिसर्च बाज़ार तक पहुँचने का पुल नहीं मिल पाती। लंबी अवधि की जोखिम भरी पूँजी भी भारत में कम है — निवेशक जल्दी मुनाफ़ा चाहते हैं, जबकि बुनियादी मॉडल बनाने में सालों और विशाल रकम लगती है।

कंपनियाँ सिर्फ़ परीक्षण तक :एआई का भविष्य तय करने वाली असली जंग रिसर्च लैब में नहीं, दफ़्तरों और कारखानों में लड़ी जाती है। नासकॉम के एक सर्वे के मुताबिक़ भारत की लगभग 75 प्रतिशत कंपनियाँ एआई को लेकर सिर्फ़ परीक्षण (प्रूफ ऑफ़ कॉन्सेप्ट) के चरण पर अटकी हैं। सिर्फ़ 13 प्रतिशत कंपनियों के पास एआई के लिए समर्पित टीम है और सिर्फ़ 18 प्रतिशत के पास डेटा के साफ़ मानक हैं। पुराने कंप्यूटर सिस्टम में एआई जोड़ना, बिखरे हुए डेटा को व्यवस्थित करना और सही लोगों की कमी — ये वे रोड़े हैं जिनकी वजह से अच्छी शुरुआत भी आगे नहीं बढ़ पाती।

नौकरियों पर असर : भारत की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है — रोज़गार। हमारा आईटी सेक्टर लाखों लोगों को रोटी देता है। आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 ने साफ़ चेतावनी दी है कि एआई के बढ़ने पर विदेशी कंपनियाँ वह काम ख़ुद करने लगेंगी, जो वे पहले भारत को देती थीं। कॉल सेंटर, सॉफ्टवेयर टेस्टिंग और बुनियादी कोडिंग जैसे काम एआई धीरे-धीरे संभालने लगा है। यह गंभीर स्थिति है — करोड़ों युवा हर साल काम ढूँढ़ने निकलते हैं और उसी वक्त बाज़ार बदल रहा है। इसका एक ही जवाब है: लोगों को नए हुनर सिखाना — तेज़ी से और बड़े पैमाने पर।

नियम और नैतिकता का धागा : तकनीक हाथ में आते ही सवाल भी आते हैं। डीपफेक वीडियो किसी के भी चेहरे और आवाज़ की नकल करके झूठ फैला सकते हैं; चुनावों के दौरान ऐसी तकनीक का दुरुपयोग ख़तरनाक हो सकता है। एआई निजता के सवाल भी खड़े करता है — हमारा डेटा कहाँ जाता है और कैसे इस्तेमाल होता है? भारत ने 2023 में डिजिटल निज डेटा संरक्षण क़ानून बनाया, पर एआई के लिए व्यापक नियम अभी अधूरे हैं। दिक्कत यह है कि क़ानून बहुत सख़्त बनाओ तो नवाचार रुकेगा और ढीला छोड़ो तो दुरुपयोग बढ़ेगा। यह संतुलन भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के लिए आसान नहीं और इसीलिए यह एक जीतती हुई चुनौती है।

आख़िरी गाँव तक पहुँचना : एआई का फ़ायदा तभी है, जब वह आख़िरी गाँव तक पहुँचे। पर आज भी करोड़ों लोगों के लिए स्मार्टफोन की कीमत, इंटरनेट की रफ्तार और डिजिटल साक्षरता — तीनों चुनौती हैं। किसान तक एआई तभी पहुँचेगा जब वह उसकी भाषा में, उसके सवालों के जवाब देगा। डिजिटल साक्षरता और भरोसे की कमी भी रास्ते की बड़ी रुकावट है। महिलाओं और छोटे कस्बों के छात्रों के लिए भी एआई का दरवाज़ा खुलना चाहिए, वरना तकनीक की दूरियाँ और बढ़ जाएँगी। शहरों की चमक देखकर गाँव को न भूलें — एआई का असली इम्तिहान भारत के गाँवों में है।

धैर्य और दिशा दोनों ही चाहिए : चुनौतियाँ ज़्यादा हैं, पर हौसला भी। भारत ने यूपीआई से साबित किया है कि वह सस्ते और आसान तकनीकी समाधान से दुनिया में मिसाल कायम कर सकता है। एआई में भी यही रास्ता हो सकता है — महँगे विदेशी मॉडलों की नकल करने के बजाय भारतीय ज़रूरतों के हिसाब से छोटे, सस्ते और भाषाई मॉडल बनाना। सरकार को रिसर्च, बिजली और शिक्षा में दीर्घकालिक निवेश करना होगा; इंडस्ट्री को परीक्षण से आगे बढ़ना होगा; और हम सबको नई तकनीक सीखने का दामन थामना होगा। कृत्रिम मेधा भारत के लिए सिर्फ़ तकनीक नहीं, बल्कि एक ऐसा इम्तिहान है जिसमें देश का धैर्य, दूरदर्शिता और साझा ज़िम्मेदारी — तीनों जाँचे जाएँगे। एआई बनाना चुनौती है, पर उसे सबके लिए बनाना असली अवसर है। और भारत के पास अवसर का एक इतिहास तो है ही — कम संसाधनों में बड़े काम करने का।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563