वीर बाल दिवस
भारत की धरती ने समय-समय पर ऐसे देशभक्त वीरों को जन्म दिया है, जिन्होंने सत्य, न्याय और धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिये । इसी गौरवशाली परम्परा में गुरु गोविंद सिंह जी के साहिबजादों का बलिदान अद्वितीय स्थान रखता है। विशेष रूप से उनके दो छोटे पुत्र , साहिबजादा जोरावर सिंह जी और साहिबजादा फतेह सिंह जी ने, जिस निर्भीकता और दृढ़ता के साथ अन्याय तथा दबाव का सामना किया, वह बाल्यावस्था में असाधारण साहस का अनुपम उदाहरण है।
इन्हीं दोनों बाल शहीदों की स्मृति में प्रत्येक वर्ष 26 दिसंबर को वीर बाल दिवस मनाया जाता है। भारत सरकार ने 9 जनवरी 2022 को वीर बाल दिवस मनाने की घोषणा की थी । इसका उद्देश्य साहिबजादों के अद्वितीय बलिदान को श्रद्धापूर्वक स्मरण करना और देश के बच्चों और युवाओं में साहस, सत्यनिष्ठा, न्यायप्रियता जैसे मूल्यों के विकास का संदेश देना है।
दसवें सिख गुरु, श्री गुरु गोविंद सिंह जी, केवल आध्यात्मिक गुरु ही नहीं, अपितु महान चिंतक, कवि, महावीर योद्धा और मानव-मर्यादा के प्रबल समर्थक थे। उनके चार साहिबजादे,साहिबजादा अजीत सिंह जी, साहिबजादा जुझार सिंह जी, साहिबजादा जोरावर सिंह जी और साहिबजादा फतेह सिंह जी,भारतीय इतिहास में त्याग और वीरता के उज्ज्वल प्रतीक हैं। बड़े साहिबजादों ने चमकौर के युद्ध में वीरतापूर्वक संघर्ष करते हुए वीरगति प्राप्त की, जबकि छोटे साहिबजादों ने सरहिंद में अपने विश्वास और आत्मसम्मान से समझौता करने से इनकार कर दिया।
बाबा जोरावर सिंह जी, आयु 9 वर्ष और बाबा फतेह सिंह जी, आयु 6 वर्ष, गुरु गोविंद सिंह जी के सबसे छोटे पुत्र थे। उन्हें क्रमशः अत्यंत कम आयु के वीर बलिदानी बालक के रूप में वर्णित किया गया है।
आनंदपुर साहिब से कठिन परिस्थितियों में अलग होने के बाद दोनों छोटे साहिबजादे अपनी दादी माता गुजरी जी के साथ आगे बढ़े। तभी उन्हें सरहिंद के तत्कालीन प्रशासक नवाब वजीर खान के समक्ष प्रस्तुत किया गया। उस क्रूर प्रशासक ने उन दोनों से अपने धर्म और विश्वास का त्याग करने तथा सत्ता के सामने झुकने के लिए प्रलोभन दिया एवं दबाव डाला ,लेकिन उन्होंने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया और बलिदान का मार्ग चुना। नवाब वजीर खान ने 26 दिसंबर, 1705 को इन दोनों बालकों को जीवित ही दीवार में चुनवा दिया।
वीर बाल दिवस का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है कि उम्र छोटी हो सकती है, लेकिन संकल्प छोटा नहीं होना चाहिए।आज के बच्चे ज्ञान-विज्ञान, खेल, कला, साहित्य, तकनीक, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक सेवा सहित अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। उन्हें साहिबजादों की गाथा से यह सीख मिल सकती है कि प्रतिभा तभी सार्थक है जब उसके साथ चरित्र और जिम्मेदारी भी जुड़ी हो। अतःसाहिबजादों की प्रेरणा को आज के जीवन से जोड़कर देखना आवश्यक है। उनका बलिदान बच्चों को लालच और डर से मुक्त होकर विवेकपूर्ण, सत्य और न्याय के साथ, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनने की प्रेरणा देता है।वीर बाल दिवस का संदेश किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है, यह भारत की उस व्यापक परम्परा का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें सत्य, न्याय, स्वतंत्रता, मूल्यों और मानव-मर्यादा को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने वीर बाल दिवस के अवसर पर साहिबजादों की पुण्य स्मृति को साहस, दृढ़ विश्वास और धर्मनिष्ठा से जोड़ा है। उनके आदर्श आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणादायक बने रहेंगे ।
26 दिसंबर केवल वीर बाल दिवस स्मरण का दिन नहीं, आत्ममंथन का दिन भी है। यह दिन हमें अपने भीतर के भय पर विजय पाने, सत्य के प्रति निष्ठावान रहने और मानवता के पक्ष में खड़े होने की प्रेरणा देता है।साहिबजादों का बलिदान भारतीय इतिहास के आकाश में ऐसे दो अमर दीपों की तरह है, जिनकी ज्योति पीढ़ी-दर-पीढ़ी साहस और आत्मसम्मान का मार्ग दिखाती रहेगी। उनके जीवन से प्रेरणा लेकर यदि भारत का प्रत्येक बालक सत्यनिष्ठ, संवेदनशील, निर्भीक और जिम्मेदार नागरिक बनने का संकल्प ले, तो यही वीर बाल दिवस की सबसे बड़ी सार्थकता होगी।
— गौरीशंकर वैश्य विनम्र
