कविता

संकल्प

​लेखनी उठा के लेख लिख तू लेखक,
पढ़े जो कोई तो स्वाभिमान जाग जाए।
लिख आत्मा को रख सामने तू जब,
देख खुद मन का स्वार्थ उतर जाए।।
​धार कर लेखनी को तू लेखक,
लिखे जब तो मन का भाव उतर जाए।
सब दुखियों की पीड़ा लिख दे तू जब,
लिखा हुआ पढ़कर भूखों का भोजन बन जाए।।
​न कर नकल किसी की तू लेखक,
कि खुद लिख अपनी तू नई राह बनाए।
करे जो नकल कहीं तुमने तू लेखक,
तो बीच भँवर में फँसता ही चला जाए।।
​बेच न देना अपनी कलम तू लेखक,
स्वतंत्र होकर लेख लिखता ही जाए।
गर बेच दिए कलम को तू लेखक जब,
समझ लेना तुम अपनी माँ को बेच आए।।
धर्म को कट्टर लिख मानव को न बाँटना,
लड़े जो मानव तो पकड़ के वही डाँटना।
हस्तक्षेप करे कोई तुमसे जब लेखक,
राष्ट्र से बड़ा कोई धर्म नहीं, ये तुम बताना।।

— सोमेश देवांगन

सोमेश देवांगन

गोपीबन्द पारा पंडरिया जिला-कबीरधाम (छ.ग.) मो.न.-8962593570