पर्दा गिर गया, नाना अमर हो गए
जिस आवाज़ में था सच का साहस,
जिस आँखों में था “दर्द”, देता राहत।
जिसके संवाद में जीवन बोलता था,
आज वो ही कलाकार मौन हो गया।
‘परिंदा’ में उसके संघर्ष की आग थी,
‘तिरंगा’ में जज़्बा-‘प्रहार’ स्वाभिमान।
‘अग्निसाक्षी’ संवेदनाओं की गहराई,
‘क्रांतिवीर’ की आवाज़ नाना महान।
‘खामोशी’ में मौन हुआ रूदन संगीत,
‘अब तक छप्पन’ में हैं कठोर चेहरा।
फिर ‘वेलकम’ में हँसाकर आ ठहरा,
अंदर इंसानियत की जीत का सेहरा।
जब ‘नटसम्राट’ बनके उभरकर आए,
सब को लगा रंगमंच स्वयं बोल पड़ा।
संवाद नहीं केवल शब्द, जीवन घुला,
किरदारों में सदा नाना रहता है खड़ा।
— संजय एम तराणेकर
