सामाजिक

अभिव्यक्ति की अनंत आकांक्षा

खुद को अभिव्यक्त करने की इच्छा मनुष्य के मन की सबसे स्वाभाविक और सबसे गहरी इच्छाओं में से एक है। यह इच्छा जन्म से ही हमारे साथ होती है। एक नवजात शिशु जब रोता है तो वह भी अपनी अभिव्यक्ति ही करता है। उसे भूख लगी है, उसे ठंड लग रही है या उसे माँ की गोद चाहिए, वह शब्दों में नहीं कह पाता लेकिन रोकर, हाथ-पैर हिलाकर वह अपने भीतर की अनुभूति को बाहर लाता है। जैसे-जैसे मनुष्य बड़ा होता है, उसकी अभिव्यक्ति के तरीके बदलते जाते हैं, लेकिन उसकी मूल आवश्यकता वही रहती है कि जो कुछ उसके भीतर है, वह किसी न किसी रूप में बाहर आए, दूसरों तक पहुँचे और समझा जाए। इसी इच्छा के कारण मनुष्य ने भाषा का विकास किया, लिपि का आविष्कार किया, कला, संगीत, नृत्य, चित्रकला और साहित्य को जन्म दिया।

मनोविज्ञान की दृष्टि से देखें तो अभिव्यक्ति आत्म-पहचान से जुड़ी हुई है। जब तक व्यक्ति अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त नहीं करता, तब तक उसे स्वयं भी यह स्पष्ट नहीं होता कि वह वास्तव में क्या सोचता है और क्या महसूस करता है। कई बार हम किसी उलझन में होते हैं और जब हम किसी मित्र से उस उलझन के बारे में बात करते हैं, तो बात करते-करते ही हमें समाधान मिल जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अभिव्यक्ति केवल दूसरों को बताने की प्रक्रिया नहीं है, वह स्वयं को समझने की प्रक्रिया भी है। भीतर चल रहे अस्पष्ट और बिखरे हुए विचारों को जब हम शब्दों में पिरोते हैं तो वे व्यवस्थित होते हैं और उनका अर्थ स्पष्ट होता है। इस प्रकार अभिव्यक्ति आत्म-चिंतन और आत्म-बोध का साधन बन जाती है।

मानव अस्तित्व का एक बड़ा प्रश्न यह है कि मैं कौन हूँ और मेरे होने का क्या अर्थ है। इस प्रश्न का उत्तर हमें तब तक नहीं मिलता जब तक हम अपने को अभिव्यक्त नहीं करते। जब हम अपने विचारों को सामने रखते हैं तो समाज उस पर प्रतिक्रिया देता है। कोई सहमत होता है, कोई असहमत होता है, कोई प्रश्न उठाता है। इन्हीं प्रतिक्रियाओं से हमें पता चलता है कि हम दूसरों से कहाँ समान हैं और कहाँ भिन्न हैं। यही भिन्नता हमारी विशिष्ट पहचान बनाती है। यदि मनुष्य में अभिव्यक्त करने की इच्छा न होती तो सभी लोग एक जैसे होते, कोई मौलिकता नहीं होती, कोई नया विचार नहीं जन्मता। विज्ञान की खोजें, साहित्य की कल्पनाएँ, समाज सुधार के आंदोलन, ये सब किसी न किसी व्यक्ति की अपनी बात को कहने के साहस का ही परिणाम हैं।

अभिव्यक्ति का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है भावनात्मक मुक्ति। हमारे मन में प्रतिदिन सैकड़ों भावनाएँ आती-जाती हैं। प्रसन्नता, दुख, प्रेम, ईर्ष्या, क्रोध, भय, आशा और निराशा। यदि इन भावनाओं को व्यक्त करने का अवसर न मिले तो वे भीतर ही एकत्रित होती रहती हैं और मन पर बोझ बन जाती हैं। आधुनिक मनोविज्ञान में इसे दमित भावनाएँ कहा जाता है। जो भावनाएँ लंबे समय तक अभिव्यक्त नहीं होतीं, वे तनाव, चिंता, अनिद्रा और यहाँ तक कि शारीरिक रोगों का कारण भी बन सकती हैं। इसके विपरीत जब व्यक्ति अपनी भावनाओं को किसी विश्वसनीय व्यक्ति के सामने कह देता है, या लिखकर, चित्र बनाकर, संगीत के माध्यम से बाहर निकाल देता है, तो उसे हल्कापन महसूस होता है। इसीलिए रो लेना, लिख लेना, खुलकर हँस लेना स्वास्थ्य के लिए आवश्यक माना जाता है। अभिव्यक्ति एक प्रकार की मानसिक सफाई है।

अभिव्यक्ति सामाजिक संबंधों की नींव भी है। हम रिश्तों में तभी गहराई ला पाते हैं जब हम अपने वास्तविक विचारों और भावनाओं को दूसरों के सामने रखते हैं। यदि पति-पत्नी, माता-पिता और संतान, मित्रों के बीच खुली अभिव्यक्ति न हो तो संबंध केवल औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। प्रेम का इजहार, क्षमा माँगना, कृतज्ञता व्यक्त करना, अपनी गलती स्वीकार करना, ये सभी अभिव्यक्ति के ही रूप हैं जो रिश्तों को जीवंत बनाते हैं। समाज में भी जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होती है, वहाँ नए विचारों का आदान-प्रदान होता है, आलोचना और आत्मालोचना होती है और समाज प्रगति करता है। जहाँ अभिव्यक्ति पर रोक लगती है, वहाँ भय और अविश्वास का वातावरण बनता है और सृजनशीलता समाप्त हो जाती है।

अभिव्यक्ति के अनेक माध्यम हैं और प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रकृति के अनुसार कोई न कोई माध्यम चुनता है। कुछ लोग शब्दों में अधिक सहज होते हैं, वे बात करके, लिखकर या कविता कहकर अपने को व्यक्त करते हैं। कुछ लोग क्रिया के माध्यम से व्यक्त होते हैं, जैसे खिलाड़ी अपने खेल से, शिल्पकार अपनी कारीगरी से, किसान अपनी फसल से अपने परिश्रम और लगन को अभिव्यक्त करता है। कला के सभी रूप अभिव्यक्ति के ही माध्यम हैं। लोकनृत्य, लोकगीत, रंगोली, मेहंदी, त्योहारों की सजावट, यहाँ तक कि हमारे पहनावे और हाव-भाव भी हमारी आंतरिक स्थिति को व्यक्त करते हैं। शिक्षा का एक प्रमुख उद्देश्य भी यही होना चाहिए कि प्रत्येक बच्चे को उसकी अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम खोजने में सहायता दी जाए, न कि सभी को एक ही साँचे में ढाला जाए।

कई बार अभिव्यक्ति की इच्छा के मार्ग में बाधाएँ आती हैं। सबसे बड़ी बाधा है अस्वीकार किए जाने का भय। बचपन से ही हमें सिखाया जाता है कि ज्यादा मत बोलो, बड़ों के सामने चुप रहो, लोग क्या कहेंगे। धीरे-धीरे हम अपने वास्तविक विचारों को छिपाना सीख जाते हैं और वही कहने लगते हैं जो दूसरों को पसंद आए। इससे हमारे भीतर दो व्यक्तित्व बन जाते हैं, एक जो हम वास्तव में हैं और दूसरा जो हम दुनिया को दिखाते हैं। इन दोनों के बीच का अंतर जितना अधिक होगा, व्यक्ति उतना ही अधिक तनाव में रहेगा। दूसरी बाधा है शब्दों या साधनों का अभाव। कई लोगों के पास गहरे अनुभव होते हैं लेकिन उन्हें व्यक्त करने के लिए उचित शब्द, भाषा या कला का ज्ञान नहीं होता। इसीलिए भाषा और कला की शिक्षा केवल विषय नहीं है, वह अभिव्यक्ति की क्षमता का विकास है। तीसरी बाधा है सुनने वालों का अभाव। यदि कोई व्यक्ति कहे और सुनने वाला कोई न हो, या सुनने वाला उपहास करे, तो कहने वाले का साहस टूट जाता है।

अभिव्यक्ति का अर्थ यह नहीं है कि हम जो मन में आए वह बिना सोचे-समझे कह दें। सच्ची अभिव्यक्ति में जिम्मेदारी और संवेदनशीलता दोनों होती हैं। अपनी बात को इस प्रकार कहना कि वह दूसरों को आहत किए बिना, स्पष्टता के साथ पहुँचे, यह भी एक कौशल है। महात्मा गांधी कहते थे कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ दूसरों की स्वतंत्रता का सम्मान करना भी है। इसलिए शिक्षा में यह सिखाना भी आवश्यक है कि अपनी बात कैसे कही जाए, कब कही जाए और किस भाषा में कही जाए। विनम्रता, तर्क और प्रमाण के साथ कही गई बात अधिक प्रभावशाली होती है और लंबे समय तक याद रखी जाती है।

आज के समय में जब सोशल मीडिया ने सभी को अभिव्यक्ति के लिए एक मंच दे दिया है, तब इस इच्छा का स्वरूप और भी महत्वपूर्ण हो गया है। हर व्यक्ति दिन में कई बार कुछ न कुछ पोस्ट करता है, अपनी तस्वीरें, अपने विचार, अपनी राय साझा करता है। यह देखकर लगता है कि अभिव्यक्ति पहले से कहीं अधिक सरल हो गई है। लेकिन वास्तविकता यह है कि इस भीड़ में सार्थक अभिव्यक्ति और भी कठिन हो गई है। क्या हम जो साझा कर रहे हैं वह हमारा वास्तविक अनुभव है या केवल दूसरों से प्रशंसा पाने का साधन है, इस पर विचार करने की आवश्यकता है। सच्ची अभिव्यक्ति का उद्देश्य प्रशंसा पाना नहीं, बल्कि सत्य को सामने लाना होता है। जब अभिव्यक्ति केवल लाइक और कमेंट के लिए की जाती है तो वह धीरे-धीरे अपनी प्रामाणिकता खो देती है।

अंत में यह समझना आवश्यक है कि खुद को अभिव्यक्त करने की इच्छा कोई बाहरी इच्छा नहीं है जिसे पूरा करना वैकल्पिक हो। यह हमारे मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक स्वास्थ्य के लिए उतनी ही आवश्यक है जितनी शरीर के लिए श्वास। जो व्यक्ति अपने को अभिव्यक्त नहीं कर पाता, वह भीतर ही भीतर घुटता रहता है और धीरे-धीरे अपनी मौलिकता खो देता है। जो व्यक्ति निरंतर और ईमानदारी से अपने को अभिव्यक्त करता है, वह न केवल स्वयं को बेहतर रूप से जान पाता है, बल्कि समाज को भी कुछ नया देता है। इसीलिए परिवार, विद्यालय और समाज का यह दायित्व है कि वे प्रत्येक व्यक्ति को, विशेषकर बच्चों और युवाओं को, यह विश्वास दिलाएँ कि उनकी बात का महत्व है, उनकी आवाज सुनने योग्य है और उनके पास कहने के लिए कुछ विशिष्ट है। जब प्रत्येक व्यक्ति को यह अवसर और सम्मान मिलता है, तभी एक सृजनशील, संवेदनशील और जीवंत समाज का निर्माण होता है।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563