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नाना पाटेकर : बेमिसाल अभिनय, असाधारण संघर्ष और अमर शख़्सियत

“मौत तो एक सच्चाई है, जो सबको आनी है, मगर कुछ लोग अपने वजूद से दिलों में इस तरह बस जाते हैं कि कभी मरते नहीं।”
जब सिनेमा के फलक पर एक ऐसा सितारा अनंत में विलीन हो जाए जिसकी गूंज सिर्फ परदे तक सीमित न रही हो, बल्कि सीधे दिलों को चीरती हुई रूह तक उतरी हो, तो अखबारों के पन्ने और शब्दों की स्याही भी कम पड़ने लगती है। भारतीय सिनेमा के अप्रतिम अभिनेता, एक असाधारण फौलादी शख्सियत और बेबाक अंदाज के धनी नाना पाटेकर का यूं चले जाना कला जगत के लिए एक ऐसा खालीपन छोड़ गया है, जिसे सदियों तक भरा नहीं जा सकता।
कल सुबह जब अखबारों के पन्ने उनके जीवन के आलेखों से रचे-बसे होंगे, तो हर आंख में एक नमी और हर ज़ुबान पर उनकी कला का सम्मान होगा। आइए, याद करें उस शख्शियत को, जिसने अभिनय को सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि एक साधना बनाया।
संघर्ष की भट्ठी में तपा हुआ सोना ,
नाना पाटेकर का सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं था। चमक-धमक वाली मायानगरी में पहुंचने से पहले उन्होंने जिंदगी के बहुत कड़े इम्तिहान देखे थे। कम उम्र में ही पिता के व्यवसाय में घाटे के बाद उन्होंने सड़क पर पोस्टर पेंट करने से लेकर सिनेमाघरों के बाहर बोर्ड रंगने तक का कठिन परिश्रम किया था।
उनके जीवन के विचार की भट्ठी ही थी, जिसने उस साधारण से दिखने वाले लड़के को ‘नाना पाटेकर’ जैसी फ़ौलादी शख्सियत में ढाल दिया। उन्होंने कला को किताबों से नहीं, बल्कि जिंदगी के थपेड़ों से सीखा था। यही कारण है कि जब वे परदे पर आते थे, तो उनका अभिनय बनावटी नहीं, बल्कि समाज के सड़े-गले सिस्टम के खिलाफ एक सुलगती हुई आग नजर आता था।
हिंदी और मराठी सिनेमा में कई दिग्गज आए, लेकिन नाना पाटेकर का अभिनय व्याकरण बिल्कुल अलग और मौलिक था।
खामोशी और आंखों की भाषा,जहां आज के दौर में अभिनेता जोर-जोर से चिल्लाकर अपनी बात मनवाने की कोशिश करते हैं, वहीं नाना की खामोशी और उनकी आंखें ही सब कुछ कह देती थीं। उनकी वह प्रसिद्ध लाइन”एक मच्छर साला आदमी को हिजड़ा बना देता है…” [खामोश!] या फिर “अरे हम तो फकीर आदमी हैं…”सिनेमा के इतिहास में अमर हो चुकी हैं।
गंभीरता से लेकर कॉमेडी तक का सफर, ‘अंकुश’ और ‘प्रतिघात’ जैसी फिल्मों में गुस्से से सुलगता युवा हो, ‘प्रहार’ में एक फौजी का अनुशासन हो, ‘क्रांतिवीर’ का प्रतापी प्रताप और उसका वह आइकॉनिक कोर्टरूम सीन हो, या फिर ‘नटसम्राट’ में एक वृद्ध अभिनेता की मानसिक और भावनात्मक टूटन—उन्होंने हर किरदार में अपनी जान फूंक दी। इसके विपरीत, ‘वेलकम’ के ‘उदय शेट्टी’ बनकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि वह जितने गंभीर अभिनेता हैं, उतने ही सहज और धमाकेदार कॉमिक कलाकार भी हैं।
फिल्मी दुनिया की चकाचौंध और स्टारडम से कोसों दूर, नाना पाटेकर ने हमेशा जमीन से जुड़कर रहना पसंद किया। मुंबई के एक साधारण से घर में बेहद सादगी भरा जीवन बिताना, किसानों के संकट के समय चुपचाप आर्थिक मदद लेकर उनके खेतों तक पहुंच जाना, और सामाजिक सरोकारों के लिए अपनी आवाज बुलंद करना,यही बातें उन्हें आम कलाकारों से अलग करती थीं।
वे सिर्फ परदे पर देशभक्त या विद्रोही नहीं बने, बल्कि असल जिंदगी में भी देश, समाज और जरूरतमंदों के प्रति पूरी तरह समर्पित रहे। उनका दिल जितना कोमल था, उनकी जुबान उतनी ही बेबाक और खरी थी। वे चापलूसी की दुनिया से कोसों दूर, अपनी शर्तों पर जीने वाले इंसान थे।
जिंदगी और मौत का चक्र अपनी गति से चलता रहता है, और हर शख्स को एक दिन इस दुनिया से रुखसत होना है। लेकिन कुछ लोग अपने कर्मों, अपनी कला और अपने उसूलों की ऐसी अमिट छाप छोड़ जाते हैं कि समय की धूल उन्हें कभी धुंधला नहीं कर सकती।
नाना पाटेकर भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनकी वह गूंजती हुई आवाज, उनकी वह पैनी निगाहें और उनके निभाए गए अमर किरदार हमेशा हमारे जेहन में जीवंत रहेंगे।
अलविदा, नाना जी! आपकी कमी यह सिनेमा हमेशा महसूस करेगा।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।