कविता

सोचकर आंखें भर आती हैं

हाथों में मोबाइल थामे,
एक कोने में बैठे हैं,
काम-धाम से नाता टूटा,
बस रील्स में ही खो ऐंठे हैं,
आज सुबह की धूप सुहानी,
बिस्तर पर ही ढल जाती है,
बच्चों की यह हालत देखकर,
सोचकर आंखें भर आती हैं,
मेहनत की राहों से भागे,
आलस को अपना मीत किया,
समय की कीमत भूल गए,
अमूल्य जीवन संगीत खो दिया,
जो आज पसीना बहाने से,
कतराते और डर जाते हैं,
वे कल जीवन के चौराहे पर,
अक्सर गहरे पछताते हैं,
बिना हुनर के,बिना ज्ञान के,
कल कैसे पहचान बनेगी?
जिम्मेदारी जब सर आएगी,
तब कैसे यह जान बचेगी?
कल रोटी की खातिर जब ये,
दर-दर ठोकर खाएंगे,
काम नहीं जो सीखा आज,
तो कल कैसे कमाएंगे?
चिंता सताए माता-पिता को,
बूढ़ी आंखें रोती हैं,
भविष्य की धुंधली सी सूरत,
मन में कांटे चुभोती है,
परेशानियां घेरेंगी कल,
जब वक्त हाथ से छूटेगा,
जो आज नहीं जागे बच्चे,
तो कल सपनों का महल टूटेगा,
उठो ओ देश के नौजवानों
इस आलस के पिंजरे को तोड़ो,
किताबों से,कर्मों से,
अपने सुंदर कल का नाता जोड़ो,
मेहनत ही है वो चाबी,
जो किस्मत का ताला खोलेगी,
आज करोगे काम-धाम,
तो कल दुनिया तुम्हारी बोलेगी।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554