इतिहास

गणेश शंकर विद्यार्थी : एक जाँबाज शहीद पत्रकार

गणेश शंकर विद्यार्थी पत्रकारिता के क्षेत्र में एक धूमकेतु, एक देदीप्यमान सितारा थे. लेकिन इनके बारे में वर्तमान के सामान्य व्यक्ति क्या पत्रकार तक भी ज्यादा से ज्यादा उनका नाम उनकी शहादत के बारे में ही जानते होंगे. किंतु उनकी योग्यता उनकी देश के प्रति समर्पण भावना तथा पत्रकारिता और सामाजिक भाईचारे का जज्बा उनमें कितना था इस बारे में बहुत काम लोग जानते हैं. और यह जज्बा ही उस महान व्यक्तित्व की 40 साल की उम्र में ही शहादत का कारण बना. बात 25 मार्च 1931 की है. देश के अमर शहीद भगत सिंह चंद्रशेखर सुखदेव और राजगुरु को फांसी दिए जाने के दो दिन बाद जब पूरे देश में अन्याय पूर्ण फांसी के विरुद्ध आंदोलन हड़ताल और विरोध के जुलूस निकल रहे थे, तब कानपुर में भी एक जुलूस निकल रहा था जो देखते ही देखते सांप्रदायिक दंगों में बदल गया था. उस दंगे की आग में हिंदू मुस्लिम दोनों पक्षों को समझाने और निर्दोष लोगों को बचाने के प्रयास में यह जुझारू पत्रकार अपनी जान पर खेल गया.
गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म 26 अक्टूबर 1890 को इलाहाबाद के अतर सुईया मोहल्ले में पिताजी नारायण जो हथगांव फतेहपुर उत्तर प्रदेश के निवासी थे के यहाँ हुआ था. मध्यम आर्थिक स्थिति वाले धार्मिक प्रवृत्ति के नारायण जी ग्वालियर के मुंगावली में एक स्कूल के हेड मास्टर के रूप में पदस्थ थे. पिता चाहते थे बेटा भी बड़ा होकर शिक्षा प्राप्त करें और कोई अच्छी सी नौकरी करे. लेकिन गणेश शंकर विद्यार्थी को जुनून था पत्रकारिता का. घर की आर्थिक स्थिति ठीक ना होने से 1908 में ही कानपुर में नौकरी की शुरुआत कर चुके थे गणेश शंकर, लेकिन यह नौकरी ज्यादा लंबी चल नहीं पाई तो यहाँ के बाद कानपुर के पृथ्वीनाथ हाई स्कूल में 1910 तक अध्यापन कार्य किया और इसी दौरान हित वार्ता, सरस्वती, कर्म योगी और स्वराज आदि समाचार पत्रों मे स्तम्भ लिखना प्रारंभ कर दिया था. कुछ ही समय बाद वे प्रसिद्ध लेखक पंडित सुंदरलाल के साथ कर्म योगी बिहार के संपादन में सहयोग करने लगे और फिर पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी के द्वारा निकाले जा रहे सरस्वती में उप संपादक के पद पर भी कार्य किया लेकिन अपनी धुन के पक्के गणेश शंकर को इतने तक ही रुक जाना संतुष्टि दायक नहीं था.
सरस्वती अखबार में कुछ समय तक ही उप संपादक रहने के बाद 1913 में अपने स्वतंत्र अखबार प्रताप की स्थापना की और बहुत मुखर रूप मे पत्रकारिता के क्षेत्र में कूद पड़े. यह प्रताप अखबार अपने नाम के अनुरूप स्वाधीनता आंदोलन में निडरता से अपनी टिप्पणियां करते हुए प्रमुख भूमिका निभा रहा था. बहुत से क्रांतिकारियों की सुरक्षा की ढाल बनाकर उनके नजरिए को खुलेआम अंग्रेज शासन के विरुद्ध प्रस्तुत करता था यह अखबार. जब गणेश शंकर विद्यार्थी की कलम चलती थी तो अंग्रेजी हुकूमत की जड़े हिलने लग जाती थी. इसी दौरान 1916 में गणेश शंकर की महात्मा गांधी से पहली मुलाकात हुई और पूर्ण रूप से स्वाधीनता आंदोलन में समर्पित होते हुए 1917 – 18 में कपड़ा मिल मजदूरों की हड़ताल को खुला समर्थन दे कर आंदोलन में भाग लिया. 1920 में रायबरेली में किसानों के हितों के लिए उन्होंने खुली लड़ाई लड़ी और गिरफ्तार हुए. 1922 में जेल से रिहा हुए लेकिन फिर भड़काऊ भाषणों के लिए रफ्तार हो गए. स्वास्थ्य खराब होने के कारण 1924 में फिर रिहा हुए और इसके तत्काल बाद 1925 के कानपुर के कांग्रेस अधिवेशन की तैयारी में लग गए. उनकी प्रतिभा और संघर्ष के जज्बे को देखते हुए उन्हे कानपुर से यूपी विधानसभा के लिए यूपी कांग्रेस समिति का अध्यक्ष बनाया गया और वे 1930 में गिरफ्तार किए गए. 1931 में गांधी इरविन पैक्ट के बाद 9 मार्च 1931 को रिहा कर दिए गए. इस तरह से लगातार अंग्रेजों के विरुद्ध आजादी के लिए सक्रिय रूप से संघर्षरत रहे.
23 मार्च 1931 को भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु को फांसी देने के विरोध में पूरे देश में बंद का आवाहन किया गया था. इसी विरोध के चलते कानपुर में भी प्रदर्शन हो रहे थे. आम जनता का अंग्रेज शासन के विरुद्ध फांसी के विरोध में एक जुलूस निकल रहा था. भारत की आजादी के लिए संघर्षरत और भगत सिंह राजगुरु सुखदेव की अन्याय पूर्ण फांसी के विरुद्ध निकल जाने वाले विरोध प्रदर्शन और जुलूस के दौरान सांप्रदायिक हिंसा भड़कना बहुत आश्चर्यजनक था. चाहे हिंदू हो या मुस्लिम सभी लोग अंग्रेजों को देश के बाहर निकलना चाहते थे. आजादी चाहते थे. उन सभी को इन क्रांतिकारियों की फांसी से दुख था और उसी आक्रोश के कारण पूरे देश में विरोध की आग लगी हुई थी. ऐसे में हिंदू मुस्लिम दंगे का क्या औचित्य था. लेकिन कानपुर में जैसे ही दंगा भड़का, स्वभाव से सादगी पूर्ण और सरल हृदय गणेश शंकर विद्यार्थी ने दंगा रोकने के लिए दोनों पक्षों को समझाया. बहुत चिंता से भागा दौड़ी करते हुए दोनों समुदाय के लोगों को खतरे से बाहर निकालने के प्रयास करते रहे. ऐसे में कुछ मुस्लिम नेता उन्हें दंगे शांत करने और भाषण देने के लिए उन्हे अपने इलाके में ले गए उस मुस्लिम नेता के साथ उसके कहने पर वे कानपुर के चौबे गोल चौराहे के पास भी गए. वहीं पर उत्तेजित भीड़ ने उन्हें घेर लिया और बड़ी बेरहमी से उनकी हत्या कर दी गई. यद्यपि गणेश शंकर विद्यार्थी ने ऐसे सांप्रदायिक दंगों में हजारों लोगों की जान बचाई थी, लेकिन वह खुद ही 41 साल की उम्र में धार्मिक उन्माद का शिकार हुए और शहीद हो गए. वे चाहते तो इस दंगाई भीड़ से बचकर निकल कर अपने सुरक्षित स्थान पर जा सकते थे. उनका कोई व्यक्तिगत झगड़ा किसी से नहीं था उन्हे कानपूर में कोई पहचानता नहीं हो ऐसा भी नही था. कुछ उनके वालों ने उन्हे सलाह भी दी की अपने आप को खतरे में कयों डाल रहे हो घर जाओ, लेकिन वे नहीं गए और लोगों को समझाने में और निर्दोष लोगों को बचाने में लगे रहे. इसके बाद भीड़ ने उन्हें बुरी तरह से कुल्हाड़ी से मार मार कर उनकी जान ले ली. दो दिन बाद उनकी लाश ऐसी स्थिति में थी जिसे पहचाना भी मुश्किल था.
उनका मृत शरीर दो तीन दिन बाद कूड़े के ढेर में बुरी तरह से क्षत विक्षत स्थिति में मिला. खादी के कपड़े पहने हाथ के टैटू और जेब में पाई गई चिट्ठियों के आधार पर उनकी पहचान हुई. हत्या के चश्मिदीद गवाह गणपत सिंह का कहना है कि मुसलमानों की उग्र भीड़ ने बड़ी निर्दयता से उनकी हत्या कर दी थी. मीडिया की और प्रशासन की सारी रिपोर्टिंग में केवल यह जिक्र है कि उन्मादी भीड़ ने उनकी हत्या की. इनमें से किसी का भी सत्य लिखने का साहस नहीं था कि दंगाइयों की भीड़ ने नहीं उग्र मुसलमान की भीड़ ने उनकी हत्या की जबकि वह हिंदू और मुसलमान दोनों के लिए समान रूप से उन्हे सुरक्षित बचाने के लिए कार्य कर रहे थे,बिना किसी भेदभाव के निर्दोष लोगों को बचाने के प्रयास कर रहे थे. इन दंगों की और हत्याकांड की कोई सघन जांच भी नहीं की गई. सुखदेव राजगुरु और भगत सिंह की फांसी के विरुद्ध कांग्रेस की ओर से निकाला गया जुलूस जिसे हिंदुस्तान के एक-एक बच्चे का समर्थन मिलना था वही जुलूस जब कानपुर के एक विशेष क्षेत्र से निकला तो उसमें देंगे क्यों भड़क उठे ? क्या यह सोचने का या जांच करने का और संबंधितों को दंडित करने का विषय नहीं था ? लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. लेखक पीयूष दुबे के अनुसार कांग्रेस पार्टी और उनके प्रमुख कथित महात्मा गांधी द्वारा यह कहकर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई कि “गणेश शंकर विद्यार्थी की मृत्यु ऐसी स्थिति में हुई है की उन्हें ऐसी मृत्यु से ईर्ष्या हो रही है. ऐसी मृत्यु बहुत फक्र की बात है काश उन्हें भी ऐसी मृत्यु मिलती.“ विद्यार्थी की वीभत्स हत्या करने वाले, उनके साथ हिंसक व्यवहार करते हुए मौत के घाट उतारने वाले व्यक्तियों या उनकी आतंकी विचारधारा के विरुद्ध एक भी शब्द बोले बिना हिंदुस्तान के महान महात्मा गांधी ने आगे कहा “उनका खून दो समुदायों के बीच दरार को जोड़ने वाली सीमेंट की तरह काम करेगा. उनकी शहादत इस नफरत के वातावरण को कमजोर करेगी “ बस इतना ही पर्याप्त था उस वीर बहादुर साहसी पत्रकार की अपनों के ही द्वारा की गई हत्या के विरोध में बोलने के लिए किसने कीया क्यों किया ऐसा किया जाना बहुत अनुचित था निंदनीय था ऐसा कुछ भी बोलना आवश्यक नहीं समझा गया. यह कौन सी महानता थी जो सिर्फ सज्जन पुरुषों को उदार लोगों को ईमानदार और न्याय के लिए लड़ने वालों और अपने प्राण गँवाने वालों को ही नसीहत देती थी उन अत्याचारियों के लिए नफरत या आलोचना तो छोड़ो आक्रोश के भी दो शब्द महात्मा गांधी की शब्दावली में नहीं थे. यह कौन सा पागलपन या जुनून उनके दिलों दिमाग में था इस आतंकी नफरती समूह की सहानुभूति और प्रशंसा प्राप्त करने का. जीवन भर कांग्रेस का बहादुर सिपाही रहते हुए साहसिक पत्रकारिता करते हुए देश की बलिवेदी पर कई अन्य क्रांतिकारी शहीदों के समान अपने प्राण न्योछावर कर देने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी को देश की जनता ह्रदय से नमन करेगी. उनका अभिवादन करेगी लेकिन इस अफसोस के साथ कि एक राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस के मुखिया द्वारा इस अन्याय के प्रतिकार में कुछ भी अपना आक्रोश व्यक्त नहीं किया गया. गलत को गलत नहीं कहा गया.

— महेश शर्मा

महेश शर्मा

जन्म -----१ दिसम्बर १९५४ शिक्षा -----विज्ञान स्नातक एवं प्राकृतिक चिकित्सक रूचि ----लेखन पठान पाठन गायन पर्यटन कार्य परिमाण ---- लभग ४५ लघुकथाएं ६५ कहानियां २०० से अधिक गीत२०० के लगभग गज़लें कवितायेँ लगभग ५० एवं एनी विधाओं में भी प्रकाशन --- दो कहानी संग्रह १- हरिद्वार के हरी -२ – आखिर कब तक एक गीत संग्रह ,, मैं गीत किसी बंजारे का ,, दो उपन्यास १- एक सफ़र घर आँगन से कोठे तक २—अँधेरे से उजाले की और इनके अलावा विभिन्न पत्रिकाओं जैसे हंस , साहित्य अमृत , नया ज्ञानोदय , परिकथा , परिंदे वीणा , ककसाड , कथाबिम्ब , सोच विचार , मुक्तांचल , मधुरांचल , नूतन कहानियां , इन्द्रप्रस्थ भारती और एनी कई पत्रिकाओं में एक सौ पचास से अधिक रचनाएं प्रकाशित एक कहानी ,, गरम रोटी का श्री राम सभागार दिल्ली में रूबरू नाट्य संस्था द्वारा मंचन मंचन सम्मान --- म प्र . संस्कृति विभाग से साहित्य पुरस्कार , बनारस से सोच्विछार पत्रिका द्वारा ग्राम्य कहानी पुरस्कार , लघुकथा के लिए शब्द निष्ठा पुरस्कार ,श्री गोविन्द हिन्दी सेवा समिती द्वाराहिंदी भाषा रत्न पुरस्कार एवं एनी कई पुरस्कार सम्प्रति – सेवा निवृत बेंक अधिकारी , रोटरी क्लब अध्यक्ष रहते हुए सामाजिक योगदान , मंचीय काव्य पाठ एनी सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से सेवा कार्य संपर्क --- धार मध्यप्रदेश – मो न ९३४०१९८९७६ ऐ मेल –mahesh .k111555@gmail.com वर्तमान निवास – महेश शर्मा द्वारा डा . गौरव शर्मा 301 तीसरा माला के जी एम हॉस्टल न्यू फेकल्टी 'खदरा' इरादत नगर पक्के पूल के पास लखनऊ उत्तर प्रदेश पिन 226020