कविता

।। जब जागो तभी सवेरा।।

सोचते ही रहोगे या
कुछ करोगे भी
प्रेम और करुणा भाव
ह्रदय भरोगे भी।।

नकारात्मक निर्णय लेने में तो
जरा सी भी देर नही लगाते
फटाफट मुंह से हामी भर देते
तनिक भर न सोचते -विचारते ।

फिर कुछ भला करने में
किस लिए इतनी टाल-मटोल
क्यों हम नही लेते त्वरित निर्णय
और मन को करते भाव विभोर ।।

देखना पलक झपकते ही
मन खुशी से नाचने लगेगा
कोई अन्य प्रसन्न हो या न हो
खुद को परम सुखद अनुभव होगा।

इसी को आज से बस तू अब
अपनी असली पूंजी जान
मत ओढ़ बाहरी दिखावे की चादर
थोड़ा समय की गति को पहचान।।

कौन जानता है आने वाला कल
किसके ऊपर मेहरबान होगा
कुछ नये फूल अवश्य खिलेंगे
कुछ का निश्चित अवसान होगा।

जो अटूट सत्य है हम
उससे ही आंख चुराते फिर रहे
सब कुछ भली भांति जानते हुए भी
इच्छाओं के दलदल में घिर रहे ।।

अब भी अगर जाग गये जो
कुछ तो भला अवश्य कर जाएंगे
थोड़ी भी मैं मैं से मुक्ति मिली तो
सच्चा आनंद इसी क्षण पाएंगे।

यह मत सोचो बहुत देर हो गयी
हर तरफ़ है बस अंधेरा ही अंधेरा
ज्ञानी जन सब पहले ही कह गये
जब जागो तभी सवेरा।।

ज्ञानी जन सब पहले ही कह गये
जब जागो तभी सवेरा ।।

— नवल अग्रवाल

*नवल किशोर अग्रवाल

इलाहाबाद बैंक से अवकाश प्राप्त पलावा, मुम्बई

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