रिश्तों का यथार्थ
‘जीने के संघर्ष में जूझते हुए, मैं एक तथ्य को समझ गई हूँ, मनोज!’ रत्ना अपनी बात पूरी कर पाती, उससे पहले ही मनोज के मुँह से निकल गया, ‘क्या?’
‘बड़े उतावले हो। जल्दबाजी सदैव से तुम्हारी कमजोरी रही है। जल्दबाजी के कारण ही तुमने जीवन में बहुत कुछ झेला है। मेरी सहायता के लिए हाथ बढ़ाने में भी तुमने कितनी जल्दबाजी की थी। मेरे बारे में अधिक कुछ जानने की कोशिश भी नहीं की थी। मैंने तुम्हारे साथ रहकर पढ़ाई अवश्य की है किंतु सीख संघर्ष से ही मिली है। जब तुम मिले थे, तब मैं कुछ भी नहीं जानती थी। एक दम निरक्षर, गँवार और मूर्ख ही थी। इसी कारण तुम्हारी दया को प्रेम समझ लिया।’ रत्ना ने कहा।
रत्ना ने मुस्कराते हुए अपनी बात आगे बढ़ाई, ‘वास्तव में दुनिया में प्रेम-व्रेम कुछ होता ही नहीं है। अधिकांश स्त्री-पुरुष किसी न किसी स्वार्थ और मजबूरी के कारण साथ-साथ रह रहे हैं। यही परिवारों का यथार्थ है।’
‘क्या कह रही हो? रिश्तों का कोई मतलब नहीं है?’ मनोज ने रत्ना की ओर प्रश्नकर्ता की दृष्टि से रत्ना की ओर देखा।
‘हाँ! तुमने ठीक समझा। सभी रिश्ते स्वार्थ पर आधारित हैं। कोई किसी को प्रेम नहीं करता। लोग अपने-अपने स्वार्थ को रिश्ते का नाम देते हैं। निःस्वार्थ तो मन्दिर में प्रसाद भी नहीं चढ़ाते। ईश्वर से भी कुछ प्राप्त करने की कामना के कारण प्रसाद चढ़ाते हैं या चढ़ाने का वचन देते हैं।’ रत्ना ने उत्तर दिया।
‘तो क्या मेरा और तुम्हारा रिश्ता स्वार्थ पर ही आधारित था?’ मनोज ने बात आगे बढ़ाई।
‘हाँ! मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है। जब तुम मिले थे। मैं एकदम बेसहारा व अनपढ़ थी। अपनी आजीविका कमाने का कोई भी साधन मेरे पास न था। तुमने सहानुभूति दिखाई और मैंने अपने आपको तुम्हारे हवाले कर दिया। तुम भी मुझे प्रेम नहीं करते थे। अपनी महानता के दंभ में मुझ पर दया करके सहारा दिया था।’
‘तुम यह सब बातें करके क्या कहना चाहती हो?’ मनोज ने रत्ना से पूछा।
रत्ना ने गंभीरतापूर्वक उत्तर दिया, ‘तुम बुद्धिमान हो। अच्छी तरह से समझ सकते हो। आज मैं अपनी आजीविका स्वयं कमाने में सक्षम हूँ। अधिक की मुझे आकांक्षा नहीं है। मैं न तो स्वार्थी हूँ और न ही लालची। तुम्हारे साथ रहने की कोई मजबूरी नहीं है। अब मैं तुम्हारे अनुसार नहीं चल सकती। अतः अपना रास्ता खुद तय करूँगी।’
— डॉ. सन्तोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
