कविता- सेल्फ़ी का जूनून
मैं सेल्फ़ी हूँ, या सेल्फ़ी हूँ मैं
समझ न आए मुझको कुछ बात,
खाना-पीना होता रहेगा,
सेल्फ़ी से कटते दिन-रात।
सेल्फ़ी को जुनून है मेरा,
या मुझे जुनून है सेल्फ़ी का,
कोई तो बताई मुझे, मैं कंफ्यूज़,
जाने कैसे बना दीवाना सेल्फ़ी का!
सेल्फ़ी भी एक लत है ऐसी,
बुरी बला भी कह सकते हैं,
आगे खाई दिखे न पीछे पहाड़
सेल्फ़ी से दिन में तारे दिखते हैं!
लाइक-टिप्पणी के लालच में,
जाने कब-कैसे-क्यों फंस गए,
लपके लार लाइक-टिप्पणी के लिए,
“वायरल” होने की चाह में धंस गए!
— लीला तिवानी
