ग़ज़ल
शहर ख़ामोशियों में पल रहे हैं,
कई चेहरे मुखौटे बन रहे हैं।
दिखे अपने भी परदे में छिपे अब,
सभी रिश्ते ज़रूरत से जुड़े हैं।
किसी की आँख में सपने हज़ारों,
किसी के ख़्वाब मिट्टी हो रहे हैं।
यहाँ बाज़ार में बिकती वफ़ाएँ,
यहाँ एहसास भी कमतर हुए हैं।
कहीं उम्मीद के दीपक जले तो,
कहीं अरमान आँसू बन बहे हैं।
मृदुल, इस शहर की फ़ितरत अजब है,
यहाँ पत्थर भी अक्सर रो रहे हैं।
— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”
