गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

शहर ख़ामोशियों में पल रहे हैं,
कई चेहरे मुखौटे बन रहे हैं।

दिखे अपने भी परदे में छिपे अब,
सभी रिश्ते ज़रूरत से जुड़े हैं।

किसी की आँख में सपने हज़ारों,
किसी के ख़्वाब मिट्टी हो रहे हैं।

यहाँ बाज़ार में बिकती वफ़ाएँ,
यहाँ एहसास भी कमतर हुए हैं।

कहीं उम्मीद के दीपक जले तो,
कहीं अरमान आँसू बन बहे हैं।

मृदुल, इस शहर की फ़ितरत अजब है,
यहाँ पत्थर भी अक्सर रो रहे हैं।

— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”

*मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016

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