गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

घूम लें माँ चार सू चल आज फिर
दृश्य मोहक चार सू है आज फिर

दिल में तो अरमान मेरे रह नहीं
होती दिलभर गुफ़्तगू है आज फिर

दिल नहीं भरता तुझे मिलकर कभी
अब मुझे दिखता तू ही तू आज फिर

गोद तेरी सर रखूँ, सोती रहूँ
आँचली दे छाँव कर तू आज फिर

जादू मौसम-ए-बहारां ने किया
दिली तमन्ना में उतर लूँ आज फिर

तेरे हाथों की मिले रोटी मुझे
पेट भरना आरज़ू है आज फिर

तुम करो तम की नहीं बातें अभी
अब उजाला बिखरा हर सू आज फिर

आज खुशियाँ जीवन में छायें सभी
ज़िन्दगी की जुस्तज़ू है आज फिर

दिल कभी कोई ‘रश्मि’ न ज़ख़्मी करे
उबला-सा मेरा ये ख़ूं है आज फिर

रवि रश्मि ‘अनुभूति’