फिर कैसे मुंह दिखाएंगे
सब बैठे हैं कुछ न कुछ लिखने को,
इसे होड़ न समझिए कि कर रहे
एक दूजे से अच्छा दिखने को,
कोई लिख रहा धार्मिक भावनाएं,
कोई लिख रहा सामाजिक प्रतिबद्धताएं,
चार लोगों की वाहवाही पा लोगे,
पर अपनी ऐतिहासिक समृद्ध परंपरा
अपनी ही मूर्खता से गंवा दोगे,
ले झूमें क्यों औरों की बकवास,
अच्छा है ढूंढें खुद का इतिहास,
मानो या फिर ना मानो
एक दिन तो ऐसा आएगा,
आने वाली अगली पीढ़ी
खरी खोटी खूब सुनाएगा,
एक एक शब्दों को काटेंगे वो
अपने ही तर्क-वितर्कों से,
छुपायेंगे कहां अपना ही लिखा
जब भरे दिखेंगे कुतर्कों से,
लिखो लेख सब ऐसा भाई,
करनी पड़े न मुंह की छुपाई,
भर दो कागज उन शब्दों से
जहां तर्क विज्ञान हो,
काट डालो पाखंडों को
मार्गदर्शक जब संविधान हो।
— राजेन्द्र लाहिरी
