गीतिका/ग़ज़ल

जीने का मजा

दर्द का हद से गुजर जाना दवा बन जाता है!
समय के बाद मिला दवा जहर बन जाता है!!

जुर्म का हद से गुजर जाना सजा बन जाता है!
और सजा का हद से गुजर जाना फना हो जाता है!!

बेबसी का हद से गुजर जाना नियती बन जाता है!
मांगने पर भी जो न मिले वही तो फकीर बन जाता है!!

इश्क का हद से गुजर जाना वफा हो जाता है!
इश्क में अक्सर महबूब खुदा बन जाता है!!

गम में समय की रफ्तार धीमा पड जाता है!
खुशियो में वक्त को जैसे पंख ही लग जाता है!!

आज के दौर में अच्छा होना गुनाह हो जाता है!
और सच्चा बनना तो हर किसी के लिए जहर बन जाता है!!

हर कही झूठ फरेब धोखा जीतता नजर आता है!
मेहनत और ईमानदारी हर कही हारता नजर आता है!!

क्या कहिये झूठ से बने इस नकली दुनिया का!
इसमें अब जीने का मजा आता नहीं !!

— विभा कुमारी “नीरजा”

*विभा कुमारी 'नीरजा'

शिक्षा-हिन्दी में एम ए रुचि-पेन्टिग एवम् पाक-कला वतर्मान निवास-#४७६सेक्टर १५a नोएडा U.P