वह घाव जो अब तक रिसते हैं
वो जो शब्दों में जहर घोलता है,
हर नज़रों में संदेह बोता है,
वही रात की चुप्पी में,
सिसकती सांसों की पीड़ा को
अपने लज्जित अधरों से चूमता है।
उसकी मर्दानगी का गुरूर,
जो ऊँचे स्वरों में आँकता है खुद को,
वही जब एकांत की हथेलियों में,
तृप्ति की नमी को महसूस करता है,
तो नतमस्तक हो,
उसके पैरों से लिपट जाता है।
कितनी अजीब है उसकी दुनिया,
जहाँ इज़्ज़त की दीवारें,
बस दिन के उजाले में खड़ी होती हैं,
रात के अंधेरों में तो वो
सभी सरहदें लांघ चुका होता है।
उसके शब्दों की कटारें,
जो हर दिन उसे लहूलुहान करती हैं,
रात में वही जुबां
एक हारे हुए योद्धा की तरह
सिर्फ मौन ओढ़ लेती है।
–डॉ. सत्यवान सौरभ
