आओ! मानवता का धर्म निभाएँ
मानवता का धर्म निभाएँ, रीति-नीति को हम अपनाएँ।
करुणा-दया, नेहपथ जाएँ, परहित को आचार बनाएँ।।
भूखे को रोटी देकर हम, मंगलमय जीवन कर जाएँ।
गहन तिमिर में प्रखर उजाला, जग को हम खुशहाल बनाएँ।।
दीन-दुखी के आँसू पौंछें, उनके लब मुस्कान सजाएँ।
करुणा-दया, नेहपथ जाएँ, परहित को आचार बनाएँ।।
ऊँचनीच को तजकर हम अब, समरसता का बिगुल बजाएँ।
भेदभाव को तजकर सारे, समता का नव सूर्य उगाएँ।।
जो निर्धन हैं उनको साधें, रोते के हम अश्रु भगाएँ।
करुणा-दया, नेहपथ जाएँ, परहित को आचार बनाएँ।।
हर मानव में प्रभु को देखें, झूठ-कपट सब त्यागें।
बहुत हो लिए, अब तो हम सब, और न सोएँ, जागें।।
कटुता, बैर से कर लें दूरी, प्रेम मिलन को हम अपनाएँ।
करुणा-दया, नेहपथ जाएँ, परहित को आचार बनाएँ।।
धर्म सदा समता लाते हैं, वैमनस्य को छोड़ें।
मानवता का यही सार है, सारे झगड़े तोड़ें।।
ख़ुदा और भगवान एक हैं, आज समझ भी जाएँ।
करुणा-दया, नेहपथ जाएँ, परहित को आचार बनाएँ।।
मानवता तो आभूषण है, इसको अब हम धारें।
सद्भावों को तजकर सारे, क्यों सद्गुण को मारें।।
बन संवेदनशील आज हम, गीत सुहाने गाएँ।
करुणा-दया, नेहपथ जाएँ, परहित को आचार बनाएँ।।
— प्रो (डॉ) शरद नारायण खरे
