कविता

रिमझिम बूंदें 

चिलचिलाती धूप, 

तेज गरमी से तप्त धरा पर,

गिरती हैं जब अंबर से रिमझिम बूंदे,

छेडती हैं मीठी सरगम, 

सौंधी-सौंधी माटी की खुशबू,

महकते बाग-सी,

चहकते मन आँगन-सी।

लुभाती हैं गरम-गरम पकौडे,

गरमा गरम चाय की खुशबू,

आह्लादित करती मन,

बचपन की लोरी-सी मीठी,

माँ के आँचल सी ममतामयी,

प्रकृति खिल-खिल इतराती,

धरा बिछाती मखमली गलीचा, 

नीलाभ नभ तानता वितान,

बादलों को ले लहराती पवन, 

गाती गीत खुशी के,

बिजुरिया चमकती,

पायलिया खनकती,

सौंधी-सौंधी खुशबू,

मन हिंडोले लेता, 

हुलार हिलोरते,

पुष्पित हिय महकने लगता।

सौंधी खुशबू से हो दीवाना,

मन मयूर झूमने लगता।

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८