इतिहास

वो शर्ट जो कभी पहनी नहीं गई 

कुछ कहानियाँ इतिहास में नहीं, दिलों में दर्ज होती हैं। वे न किताबों में मिलती हैं, न अभिलेखों में। वे उन चुप चिट्ठियों में बसती हैं, जिन पर आँसुओं की स्याही लगी होती है। यह कहानी भी ऐसी ही एक चिट्ठी से शुरू होती है।

22 साल पहले, हिमाचल प्रदेश की एक पहाड़ी बस्ती से एक पत्र रक्षा मंत्रालय को भेजा गया। पत्र का लेखक कोई राजनेता, उद्योगपति या रिटायर्ड फौजी नहीं था। वह था— एक स्कूल मास्टर। एक शिक्षक, एक पिता, जिसकी आँखें अब अपने बेटे की तस्वीर में नहीं, उसकी मिट्टी में उसे ढूँढ रही थीं।

उस चिट्ठी में न कोई गुस्सा था, न कोई अधिकारवाणी। बस एक विनती थी— “क्या हम वहाँ जा सकते हैं जहाँ हमारा बेटा गिरा था?”

कारगिल युद्ध में उनका बेटा शहीद हुआ था। 7 जुलाई 2000 को उसकी पहली पुण्यतिथि थी। माँ-बाप की यही अंतिम इच्छा थी कि वे उस भूमि को देख सकें जहाँ उनके बेटे ने अंतिम साँस ली थी। साथ में यह भी लिखा था कि यदि यह राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ हो, तो वे आवेदन वापस ले लेंगे।

रक्षा मंत्रालय में जब यह पत्र पहुँचा, तो एक अधिकारी उसे पढ़ते-पढ़ते ठहर गया। एक क्षण को, यह चिट्ठी बाकी सभी फाइलों पर भारी पड़ गई। उसमें एक बेटे का नाम नहीं था, पर हर शब्द में उसकी छाया थी। उस अधिकारी ने तत्काल निर्णय लिया—

“अगर मंत्रालय नहीं मानता, तो मैं खुद अपने वेतन से इन माता-पिता का दौरा करवाऊँगा।”

आदेश जारी हुआ, यात्रा तय हुई, और कारगिल की उस ऊँचाई पर दो साधारण वृद्ध लोगों को लाया गया, जिन्होंने असाधारण त्याग किया था।

जब वे पहुँचे, तो वहाँ मौजूद सैनिकों ने खड़े होकर उन्हें सलामी दी। कुछ तो आंसू नहीं रोक पाए। पर एक जवान चुपचाप आगे आया। उसके हाथ में फूलों का गुलदस्ता था। उसने झुककर माँ-बाप के पैर छुए।

पिता बोले: “तुम तो अधिकारी हो बेटा, मेरे पैर क्यों छूते हो?”

उस जवान की आवाज काँप रही थी, पर शब्द साफ़ थे:

> “सर, मैं वहीं था, जब आपके बेटे ने अपने सीने से गोलियाँ खाईं। हम दुश्मन के बंकर से तीस फीट दूर थे। गोलियाँ बारिश की तरह गिर रही थीं। मैं तैयार था डेथ-चार्ज के लिए। तभी आपके बेटे ने मेरी बाँह पकड़ी और कहा— ‘तुम्हारे घर पर पत्नी और बच्चे इंतज़ार कर रहे हैं। मैं अकेला हूँ। मैं जाऊँगा।’”

“उसने मुझसे ग्रेनेड छीना और सीधा दौड़ पड़ा। एचएमजी की गोलियाँ उसके सामने से चीखती हुई निकलीं, लेकिन वो नहीं रुका। उसने दुश्मन के बंकर में ग्रेनेड फेंका। तेरह दुश्मनों को वहीं मार गिराया। और फिर… फिर जब मैं दौड़कर पहुँचा, वो वहीं पड़ा था… छाती में 42 गोलियों के साथ। उसकी आख़िरी साँसें चल रही थीं। उसने मेरी गोद में सिर रखा और कहा—

‘ये दिल माँगे मोर… जय हिंद!’”

माँ चुपचाप अपने आँचल में सिसक रही थीं। लेकिन पिता— नहीं रोए।

वो कुछ क्षण शांत रहे, फिर जेब से एक तह की हुई शर्ट निकाली। धीरे से उस जवान को दी और बोले:

“ये शर्ट मैंने अपने बेटे के लिए खरीदी थी, छुट्टी पर पहनने के लिए। पर वो कभी आया नहीं… अब तुम इसे रख लो बेटा। उसे तुम्हारे कंधों पर देख, ऊपर से उसे सुकून मिलेगा।”

यह कोई फिल्मी दृश्य नहीं था। यह था जीवन का सबसे सच्चा फ्रेम।

विक्रम बत्रा— वही शेरशाह— जिसने अपनी जान देकर पॉइंट 5140 पर तिरंगा फहराया। IMA से पास होने के बाद विक्रम ने कहा था:

“या तो मैं तिरंगा लहराऊँगा, या उसमें लिपटकर आऊँगा।”

कारगिल युद्ध में, उन्होंने यह वादा निभाया। जब रेडियो पर पहली बार उनकी आवाज़ आई—

“ये दिल माँगे मोर!”

तो पूरी भारतीय सेना का हौसला नई ऊँचाइयों पर जा पहुँचा। विक्रम बत्रा को ‘शेरशाह’ कहकर बुलाया जाने लगा, क्योंकि दुश्मन भी उनके नाम से काँपते थे।

पर युद्ध केवल गोलियों की गिनती नहीं होता। युद्ध वह शर्ट होती है, जो कभी पहनी नहीं जाती। वह माँ होती है, जो हर दरवाज़े की आहट पर बेटे की परछाईं ढूँढती है। वह पिता होता है, जो अपने आँसुओं को कर्तव्य के नाम पर होठों से रोकता है।

कारगिल की चोटियों पर जो युद्ध लड़ा गया, वह केवल सीमाओं के लिए नहीं था, वह उन सपनों के लिए था जो हर पिता अपने बेटे के लिए देखता है। विक्रम बत्रा ने न केवल दुश्मनों को हराया, उन्होंने एक उदाहरण भी छोड़ दिया कि वीरता क्या होती है, और बलिदान क्या माँगता है।

उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। पर उस पुरस्कार से बड़ा सम्मान उस दिन हुआ जब एक जवान ने उस पिता के चरणों में फूल रखे।

‘शेरशाह’ फिल्म ने हमें विक्रम की कहानी बताई, लेकिन जो दृश्य उस दिन माँ-बाप की आँखों में बसा, वह किसी स्क्रीन पर नहीं आ सकता।

वह पिता अब भी गाँव में उसी स्कूल में पढ़ाते हैं। वे जब कभी पुराने कपड़ों की अलमारी खोलते हैं, तो वह शर्ट सबसे ऊपर रखी होती है। एक शर्ट… जो कभी नहीं पहनी गई… पर जिसने भारत का मस्तक ऊँचा किया।

जब भी तिरंगा लहराता है, याद रखिए, यह केवल कपड़ा नहीं है। यह किसी माँ के आँचल का टुकड़ा है, किसी पिता के टूटे सपने की राख है। यह हर उस सैनिक की अंतिम साँसों की गंध है, जो देश के लिए हँसते-हँसते कुर्बान हो गया।

विक्रम बत्रा एक नाम नहीं, एक परंपरा हैं। एक लौ हैं, जो हर पीढ़ी के अंदर साहस जलाती है। और उस लौ की परछाई में अब भी एक पिता खड़ा है, जो हर दिन बच्चों को पढ़ाते हुए मन ही मन कहता है— “ये दिल माँगे मोर…”

—  डॉ. सत्यवान सौरभ

*डॉ. सत्यवान सौरभ

✍ सत्यवान सौरभ, जन्म वर्ष- 1989 सम्प्रति: वेटरनरी इंस्पेक्टर, हरियाणा सरकार ईमेल: satywanverma333@gmail.com सम्पर्क: परी वाटिका, कौशल्या भवन , बड़वा (सिवानी) भिवानी, हरियाणा – 127045 मोबाइल :9466526148,01255281381 *अंग्रेजी एवं हिंदी दोनों भाषाओँ में समान्तर लेखन....जन्म वर्ष- 1989 प्रकाशित पुस्तकें: यादें 2005 काव्य संग्रह ( मात्र 16 साल की उम्र में कक्षा 11th में पढ़ते हुए लिखा ), तितली है खामोश दोहा संग्रह प्रकाशनाधीन प्रकाशन- देश-विदेश की एक हज़ार से ज्यादा पत्र-पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशन ! प्रसारण: आकाशवाणी हिसार, रोहतक एवं कुरुक्षेत्र से , दूरदर्शन हिसार, चंडीगढ़ एवं जनता टीवी हरियाणा से समय-समय पर संपादन: प्रयास पाक्षिक सम्मान/ अवार्ड: 1 सर्वश्रेष्ठ निबंध लेखन पुरस्कार हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड भिवानी 2004 2 हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड काव्य प्रतियोगिता प्रोत्साहन पुरस्कार 2005 3 अखिल भारतीय प्रजापति सभा पुरस्कार नागौर राजस्थान 2006 4 प्रेरणा पुरस्कार हिसार हरियाणा 2006 5 साहित्य साधक इलाहाबाद उत्तर प्रदेश 2007 6 राष्ट्र भाषा रत्न कप्तानगंज उत्तरप्रदेश 2008 7 अखिल भारतीय साहित्य परिषद पुरस्कार भिवानी हरियाणा 2015 8 आईपीएस मनुमुक्त मानव पुरस्कार 2019 9 इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ रिसर्च एंड रिव्यु में शोध आलेख प्रकाशित, डॉ कुसुम जैन ने सौरभ के लिखे ग्राम्य संस्कृति के आलेखों को बनाया आधार 2020 10 पिछले 20 सालों से सामाजिक कार्यों और जागरूकता से जुडी कई संस्थाओं और संगठनों में अलग-अलग पदों पर सेवा रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, दिल्ली यूनिवर्सिटी, कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 9466526148 (वार्ता) (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) 333,Pari Vatika, Kaushalya Bhawan, Barwa, Hisar-Bhiwani (Haryana)-127045 Contact- 9466526148, 01255281381 facebook - https://www.facebook.com/saty.verma333 twitter- https://twitter.com/SatyawanSaurabh