ज़िंदगी की किताब और सब्र का कवर
ज़िंदगी को अगर एक किताब मान लिया जाए तो ये किताब हर किसी की अपनी अपनी होती है। कुछ के पन्ने रंगीन होते हैं, कुछ फीके, कुछ उजले और कुछ दर्द से लिखे हुए। लेकिन इस किताब को मुकम्मल बनाए रखने के लिए जो चीज़ सबसे ज़्यादा ज़रूरी है, वो है – “सब्र का कवर”।
जैसे एक किताब को सामने से पीछे तक बाँध कर रखने वाला हिस्सा उसका कवर होता है, जो हर पन्ने को महफूज़ रखता है, ठीक वैसे ही ज़िंदगी में सब्र (धैर्य) वो कवर है जो हमारे टूटे-बिखरे लम्हों को बाँध देता है।
जब रंज-,-ग़म (दुःख और तकलीफें) आ जाएँ, जब ख़ुशियाँ मुनक़तअ (छोटी और अस्थायी) लगें, जब हमारी कहानी इधर-उधर बिखरने लगे तभी तो सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है उस धागे की जो इन सबको फिर से जोड़ता है। और वो धागा है,सब्र।
जैसे जैसे वक़्त गुजरता है।
हर दिन एक नया पन्ना है। किसी दिन का पन्ना आँसुओं से भीगा होता है, तो किसी दिन का पन्ना मुस्कुराहट से महकता है। लेकिन उसी किताब में कुछ पन्ने ऐसे भी होते हैं जो चाह कर भी समझ नहीं आते, सिर्फ़ सब्र ही उन्हें समझने का हौसला देता है।
सब्र तालीम देता है कि ठहर जाओ, सोचो, साँस लो,हर चीज़ का वक़्त होता है।
“अगर सब्र न हो तो?”
फिर तो ज़िंदगी के ये पन्ने हवा में उड़ जाते हैं। कोई एक पन्ना खो जाए तो पूरी कहानी अधूरी लगती है, जैसे एक टूटा तानाबाना। सब्र ही वो ताक़त है जो हर पन्ने को न सिर्फ़ जोड़ता है, बल्कि उन्हें एक मुकम्मल अफ़साना बना देता है।
पेग़ाम (संदेश):
ज़िंदगी एक किताब है जिसकी सूरत बिखर भी सकती थी, मगर सब्र का कवर इसे बाँधे रखता है।
हर मुस्कान, हर आँसू, हर ठहराव , सब कुछ इसी सब्र से बने एक दस्तावेज़ में तब्दील हो जाता है।
इसलिए, चाहे हालात कैसे भी हों, सब्र को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाईए।
यही वो तीरगी में रौशनी की शम्अ है जो हर पन्ने को नूर दे देती है।
— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह सहज़
