कविता

लक्ष्मण रेखा पार करता मानव

झूठ का संमन्दर अपार
लालच की गगरी फोड़कर
निकल रहा मतलबी बन जमाना
लक्ष्मण रेखा पार करता मानव।
अपनों को पीढ़ा पहुंचा रहे
मां बाप को वृध्दाश्रम में भेजकर
रिश्तों का आज कोई मोल नहीं रहा ?
लक्ष्मण रेखा पार करता मानव।
आज ऐसे दृश्य बहुत ज्यादा है
कही बिमारी से त्रस्त बेटा
बिस्तर पर लेटा
और पिता उसके लिए निशब्द क्यों है
आज संवेदनाएं मौन है
क्योंकि लक्ष्मण रेखा पार करता मानव है।
यहां दूरियों का बढ़ता हुआ परिदृश्य
मानवीय मूल्यों का घटता कलेवर
देखकर कुछ लोग हैरान परेशान हैं
क्योंकि लक्ष्मण रेखा पार करता मानव है।।

— हरिहर सिंह चौहान

हरिहर सिंह चौहान

जबरी बाग नसिया इन्दौर मध्यप्रदेश 452001 मोबाइल 9826084157