अंधश्रद्धा की आग
ज्योत जली पर दीप बुझा क्यों,
आस्था थी या भ्रम छिपा क्यों?
कंधे पर कांवड़, माथे तिलक,
पग पग पर था पाखंड विलख।
शिक्षक पिता, फिर भी मौन रहे,
तर्क के स्वर क्यों कोने में ढहे?
गांजे-धतूरे की गंध में सना,
शिवभक्ति का यह कैसा सपना?
शब्द थे गुरु के— पढ़ो बेटा,
कांवड़ नहीं बनाता नेता।
पर विवेक को ठुकरा दिया,
अंधविश्वास को खड़ा किया।
अब बेटा सोया शमशान में,
क्या मिला तुझे उस भगवान में?
जो खुद चले न, राह दिखाए,
ऐसे पथिक क्या गंतव्य पाए?
बाबा साहेब ने पुस्तक दी थी,
तर्क की मशाल थमा दी थी।
हमने फिर भी दीप जलाकर,
धुंध में क्यों डूबे आकार?
हे नवयुवक! यह वक्त पुकारे,
ज्ञान से गढ़ो देश के तारे।
कांवड़ नहीं, कलम उठाओ,
भविष्य को नव सूरज बनाओ।
— प्रियंका सौरभ
