कविता

तू लीला, मैं लीलाधर

कन्हैया रात सपने में आया,
क्या अनोखा नजारा था,
कन्हैया मुझे निहार रहा था,
मैंने कन्हैया को निहारा था।

मोरमुकुट वाले बंसी-बजैया,
नाग-नथैया, धेनु-चरैया,
सामने मेरे साक्षात खड़े थे,
बांकेबिहारी कृष्ण कन्हैया।

कितनी देर लगाई कन्हैया ने,
शुक्र है दर्शन-दीदार तो हुआ,
चरण स्पर्श किए मैंने सम्मान से,
दिल मेरा कन्हैया का दीवाना हुआ।

मैं मस्ती में मस्त झूम रही थी,
भोर का सूरज भी झूमने लगा,
मैं तो कन्हैया की हो ही चुकी थी,
सूरज भी कनु के चरण चूमने लगा।

मेरी और कन्हैया की प्रीत पुरानी,
कन्हैया बोले “तू लीला, मैं लीलाधर”,
सादर नमन कर मैंने कहा, “जय हो,
मेरे कन्हैया हे मुरलीधर हे मेरे गिरधर।”

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244