तुझको छोड़ कहां मैं जाऊं?
अब तू ही तो बता साथिया,
तुझको छोड़ कहां मैं जाऊं?
तू गंगा यमुना कावेरी,
सी पावन शीतल निर्मल है।
तू ही मेरे हर सवाल का,
सर्वोत्तम समुचित शुभ हल है।
तू मेरे मन का मनका है,
तुझको जपूंं, तुझी को पाऊं।
मैं आवारा अवश अनाड़ी,
इधर-उधर फिरना फितरत है।
तू चपला चंचल चमकीली,
प्यासी धरती की हसरत है।
किससे करूं याचना? बोलो
किस पनघट पर प्यास बुझाऊं?
मैं निर्बल, तू मेरा संबल,
संगम से पूरा हो जीवन।
अगर ख़ुदा ने ज़ुदा किया तो
तन हो कहीं,कहीं पर हो मन।
प्रेम हमारा रहे सलामत,
बुरी नजर से कहां छुपाऊं?
राम-सिया, राधा-केशव या,
शम्भु – सती, दुष्यन्त पियारी।
मिलन हेतु पग-पग बाधा से,
जूझ रहे हैं हर नर – नारी।
प्रेम पुण्य है या कि पाप, यह
समझूं तब तुझको समझाऊं।
कैसे मिलें नदी के दो तट,
धारा तीव्र प्रवाहमयी है।
तेरा – मेरा प्रेम अमर, पर
शंका होने में विजयी है।
ऐसे हालातों में किस विधि,
अवध प्रीति की रीति निभाऊं?
— डॉ अवधेश कुमार अवध
